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"text": "(१-३) १ विश्वामित्रः, २ गोतमः, ३ विरूपः। १ इन्द्रः, २ मरुतः, ३ अग्निः। गायत्री।\nइन्द्र॑ त्वा वृष॒भं व॒यं सु॒ते सोमे॑ हवामहे । स पा॑हि॒ मध्वो॒ अन्ध॑सः ॥१॥\nमरु॑तो॒ यस्य॒ हि क्षये॑ पा॒था दि॒वो वि॑महसः । स सु॑गो॒पात॑मो॒ जनः॑ ॥२॥\nउ॒क्षान्ना॑य व॒शान्ना॑य॒ सोम॑पृष्ठाय वे॒धसे॑ । स्तोमै॑र्विधेमा॒ग्नये॑ ॥३॥\n"
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"text": "१-४ गृत्सोमदो ( मेधातिथिर्वा)। १ मरुतः, २ अग्निः, ३ इन्द्रः, ४ द्रविणोदाः। १-२ विराड् गायत्री, ३ आर्च्युष्णिक्, ४ साम्नी त्रिष्टुप् (१-४ एकावसाना)।\nम॒रुतः॑ पो॒त्रात् सु॒ष्टुभः॑ स्व॒र्कादृ॒तुना॒ सोमं॑ पिबन्तु ॥१॥\nअ॒ग्निराग्नी॑ध्रात् सु॒ष्टुभः॑ स्व॒र्कादृ॒तुना॒ सोमं॑ पिबतु ॥२॥\nइन्द्रो॑ ब्र॒ह्मा ब्राह्म॑णात् सु॒ष्टुभः॑ स्व॒र्कादृ॒तुना॒ सोमं॑ पिबतु ॥३॥\nदे॒वो द्र॑विणो॒दाः पो॒त्रात् सु॒ष्टुभः॑ स्व॒र्कादृ॒तुना॒ सोमं॑ पिबतु ॥४॥\n"
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"text": "१-३ इरिम्बिठिः । इन्द्रः।\n"
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"text": "१-३ इरिम्बिठिः। इन्द्रः। गायत्री।\nआ नो॑ याहि सु॒ताव॑तो॒ऽस्माकं॑ सुष्टु॒तीरुप॑ । पिबा॒ सु शि॑प्रि॒न्नन्ध॑सः ॥१॥\nआ ते॑ सिञ्चामि कु॒क्ष्योरनु॒ गात्रा॒ वि धा॑वतु । गृ॒भा॒य जि॒ह्वया॒ मधु॑ ॥२॥\nस्वा॒दुष्टे॑ अस्तु सं॒सुदे॒ मधु॑मान् त॒न्वे॒३ तव॑ । सोमः॒ शम॑स्तु ते हृ॒दे॥३॥\n"
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"text": "१-७ इरिम्बिठिः। इन्द्रः। गायत्री।\nअ॒यमु॑ त्वा विचर्षणे॒ जनी॑रिवा॒भि संवृ॑तः । प्र सोम॑ इन्द्र सर्पतु ॥१॥\nतु॒वि॒ग्रीवो॑ व॒पोद॑रः सुबा॒हुरन्ध॑सो॒ मदे॑ । इन्द्रो॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नते ॥२॥\nइन्द्र॒ प्रेहि॑ पु॒रस्त्वं विश्व॒स्येशा॑न॒ ओज॑सा ।वृ॒त्राणि॑ वृत्रहं जहि ॥३॥\nदी॒र्घस्ते॑ अस्त्वङ्कु॒शो येना॒ वसु॑ प्र॒यच्छ॑सि । यज॑मानाय सुन्व॒ते॥४॥\nअ॒यं त॑ इन्द्र॒ सोमो॒ निपू॑तो॒ अधि॑ ब॒र्हिषि॑ । एही॑म॒स्य द्रवा॒ पिब॑ ॥५॥\nशाचि॑गो॒ शाचि॑पूजना॒यं रणा॑य ते सु॒तः। आख॑ण्डल॒ प्र हू॑यसे ॥६॥\nयस्ते॑ शृङ्गवृषो नपा॒त् प्रण॑पात् कुण्ड॒पाय्यः॑ । न्यस्मिन्दध्र॒ आ मनः॑ ॥७॥\n"
},
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"text": "१-९ विश्वामित्रः। इन्द्रः। गायत्री।\nइन्द्र॑ त्वा वृष॒भं व॒यं सु॒ते सोमे॑ हवामहे । स पा॑हि मध्वो॒ अन्ध॑सः ॥१॥\nइन्द्र॑ क्रतु॒विदं॑ सु॒तं सोमं॑ हर्य पुरुष्टुत । पिबा वृ॑षस्व॒ तातृ॑पिम्॥२॥\nइन्द्र॒ प्र णो॑ धि॒तावा॑नं य॒ज्ञं विश्वे॑भिर्दे॒वेभिः॑। ति॒र स्त॑वान विश्पते ॥३॥\nइन्द्र॒ सोमाः॑ सु॒ता इ॒मे तव॒ प्र य॑न्ति सत्पते । क्षयं॑ च॒न्द्रास॒ इन्द॑वः ॥४॥\nद॒धि॒ष्वा ज॒ठरे॑ सु॒तं सोम॑मिन्द्र॒ वरे॑ण्यम्। तव॑ द्यु॒क्षास॒ इन्द॑वः ॥५॥\nगिर्व॑णः पा॒हि नः॑ सु॒तं मधो॒र्धारा॑भिरज्यसे । इन्द्र॒ त्वादा॑त॒मिद् यशः॑ ॥६॥\nअ॒भि द्यु॒म्नानि॑ व॒निन॒ इन्द्रं॑ सचन्ते॒ अक्षि॑ता । पी॒त्वी सोम॑स्य वावृधे ॥७॥\nअ॒र्वा॒वतो॑ न॒ आ ग॑हि परा॒वत॑श्च वृत्रहन्। इ॒मा जु॑षस्व नो॒ गिरः॑ ॥८॥\nयद॑न्त॒रा प॑रा॒वत॑मर्वा॒वतं॑ च हू॒यसे॑ । इन्द्रे॒ह तत॒ आ ग॑हि ॥९॥\n"
},
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"text": "(१-४) १-३ सुकक्षः। ४ विश्वामित्रः। इन्द्रः। गायत्री।\nउद् घेद॒भि श्रु॒ताम॑घं वृष॒भं नर्या॑पसम्। अस्ता॑रमेषि सूर्य ॥१॥\nनव॒ यो न॑व॒तिं पुरो॑ बि॒भेद॑ बा॒ह्वोजसा । अहिं॑ च वृत्र॒हाव॑धीत्॥२॥\nसन॒ इन्द्रः॑ शि॒वः सखाश्वा॑व॒द् गोम॒द् यव॑मत्। उ॒रुधा॑रेव दोहते ॥३॥\nइन्द्र॑ क्रतु॒विदं॑ सु॒तं सोमं॑ हर्य पुरुष्टुत । पिबा वृ॑षस्व॒ तातृ॑पिम्॥४॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 8,
"text": "(१-३) १ भरद्वाजः, २ कुत्सः, ३ विश्वामित्रः। इन्द्रः। त्रिष्टुप्।\nए॒वा पा॑हि प्र॒त्नथा॒ मन्द॑तु त्वा श्रु॒धि ब्रह्म॑ वावृ॒धस्वो॒त गी॒र्भिः ।\nआ॒विः सूर्यं॑ कृणु॒हि पी॑पि॒हीषो॑ ज॒हि शत्रूं॑र॒भि गा इ॑न्द्र तृन्धि ॥१॥\nअ॒र्वाङेहि॒ सोम॑कामं त्वाहुर॒यं सु॒तस्तस्य॑ पिबा॒ मदा॑य ।\nउ॒रु॒व्यचा॑ ज॒ठर॒ आ वृ॑षस्व पि॒तेव॑ नः शृणुहि हू॒यमा॑नः ॥२॥\nआपू॑र्णो अस्य क॒लशः॒ स्वाहा॒ सेक्ते॑व॒ कोशं॑ सिसिचे॒ पिब॑ध्यै ।\nसमु॑ प्रि॒या आव॑वृत्र॒न् मदा॑य प्रदक्षि॒णिद॒भि सोमा॑स॒ इन्द्र॑म्॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 9,
"text": "(१-४) १-२ नोधा, ३४ मेध्यातिथिः। इन्द्रः। १-२ त्रिष्टुप्, ३४ प्रगाथः। (बृहती+सतोबृहती)।\nतं वो॑ द॒स्ममृ॑ती॒षहं॒ वसो॑र्मन्दा॒नमन्ध॑सः ।\nअ॒भि व॒त्सं न स्वस॑रेषु धे॒नव॒ इन्द्रं॑ गी॒र्भिर्न॑वामहे ॥१॥\nद्यु॒क्षं सु॒दानुं॒ तवि॑षीभि॒रावृ॑तं गि॒रिं न पु॑रु॒भोज॑सम्।\nक्षु॒मन्तं॒ वाजं॑ श॒तिनं॑ सह॒स्रिणं॑ म॒क्षू गोम॑न्तमीमहे ॥२॥\nतत् त्वा॑ यामि सु॒वीर्यं॒ तद् ब्रह्म॑ पू॒र्वचि॑त्तये ।\nयेना॒ यति॑भ्यो॒ भृग॑वे॒ धने॑ हि॒ते येन॒ प्रस्क॑ण्व॒मावि॑थ ॥३॥\nयेना॑ समु॒द्रमसृ॑जो म॒हीर॒पस्तदि॑न्द्र॒ वृष्णि॑ ते॒ शवः॑ ।\nस॒द्यः सो अ॑स्य महि॒मा न सं॒नशे॒ यं क्षो॒णीर॑नुचक्र॒दे॥४॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 10,
"text": "१-२ मेध्यातिथिः। इन्द्रः। प्रगाथ। (बृहती+ सतोबृहती)।\nउदु॒ त्ये मधु॑मत्तमा॒ गिर॒ स्तोमा॑स ईरते ।\nस॒त्रा॒जितो॑ धन॒सा अक्षि॑तोतयो वाज॒यन्तो॒ रथा॑ इव ॥१॥\nकण्वा॑ इव॒ भृग॑वः॒ सूर्या॑ इव॒ विश्व॒मिद्धी॒तमा॑नशुः ।\nइन्द्रं॒ स्तोमे॑भिर्म॒हय॑न्त आ॒यवः॑ प्रि॒यमे॑धासो अस्वरन्॥२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 11,
"text": "१-११ विश्वामित्र। इन्द्रः। त्रिष्टुप्।\nइन्द्रः॑ पू॒र्भिदाति॑र॒द् दास॑म॒र्कैर्वि॒दद्व॑सु॒र्दय॑मानो॒ वि शत्रू॑न्।\nब्रह्म॑जूतस्त॒न्वा वावृधा॒नो भूरि॑दात्र॒ आपृ॑ण॒द् रोद॑सी उ॒भे॥१॥\nम॒खस्य॑ ते तवि॒षस्य॒ प्र जू॒तिमिय॑र्मि॒ वाच॑म॒मृता॑य॒ भूष॑न्।\nइन्द्र॑ क्षिती॒नाम॑सि॒ मानु॑षीणां वि॒शां दैवी॑नामु॒त पू॑र्व॒यावा॑ ॥२॥\nइन्द्रो॑ वृ॒त्रम॑वृणो॒च्छर्ध॑नीतिः॒ प्र मा॒यिना॑ममिना॒द् वर्प॑णीतिः ।\nअह॒न् व्यंसमु॒शध॒ग् वने॑ष्वा॒विर्धेना॑ अकृणोद् रा॒म्याणा॑म्॥३॥\nइन्द्रः॑ स्व॒र्षा ज॒नय॒न्नहा॑नि जि॒गायो॒शिग्भिः॒ पृत॑ना अभि॒ष्टिः ।\nप्रारो॑चय॒न्मन॑वे के॒तुमह्ना॒मवि॑न्द॒ज्ज्योति॑र्बृह॒ते रणा॑य ॥४॥\nइन्द्र॒स्तुजो॑ ब॒र्हणा॒ आ वि॑वेश नृ॒वद् दधा॑नो॒ नर्या॑ पु॒रूणि॑ ।\nअचे॑तय॒द् धिय॑ इ॒मा ज॑रि॒त्रे प्रेमं वर्ण॑मतिरच्छु॒क्रमा॑साम्॥५॥\nम॒हो म॒हानि॑ पनयन्त्य॒स्येन्द्र॑स्य॒ कर्म॒ सुकृ॑ता पु॒रूणि॑ ।\nवृ॒जने॑न वृजि॒नान्त्सं पि॑पेष मा॒याभि॒र्दस्यूंर॒भिभू॑त्योजाः ॥६॥\nयु॒धेन्द्रो॑ म॒ह्ना वरि॑वश्चकार दे॒वेभ्यः॒ सत्प॑तिश्चर्षणि॒प्राः ।\nवि॒वस्व॑तः॒ सद॑ने अस्य॒ तानि॒ विप्रा॑ उ॒क्थेभिः॑ क॒वयो॑ गृणन्ति ॥७॥\nस॒त्रा॒साहं॒ वरे॑ण्यं सहो॒दां स॑स॒वांसं॒ स्वर॒पश्च॑ दे॒वीः ।\nस॒सान॒ यः पृ॑थि॒वीं द्यामु॒तेमामिन्द्रं॑ मद॒न्त्यनु॒ धीर॑णासः ॥८॥\nस॒सानात्यां॑ उ॒त सूर्यं॑ ससा॒नेन्द्रः॑ ससान पुरु॒भोज॑सं॒ गाम्।\nहि॒र॒ण्यय॑मु॒तभोगं॑ ससान ह॒त्वी दस्यू॒न् प्रार्यं॒ वर्ण॑मावत्॥९॥\nइन्द्र॒ ओष॑धीरसनो॒दहा॑नि॒ वन॒स्पतीँ॑रसनोद॒न्तरि॑क्षम्।\nबि॒भेद॑ ब॒लं नु॑नु॒दे विवा॒चोऽथा॑भवद् दमि॒ताभिक्र॑तूनाम्॥१०॥\nशु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन् भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ ।\nशृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥११॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 12,
"text": "(१-७) १-६ वसिष्ठः, ७ अत्रिः। इन्द्रः। त्रिष्टुप्।\nउदु॒ ब्रह्मा॑ण्यैरत श्रव॒स्येन्द्रं॑ सम॒र्ये म॑हया वसिष्ठ ।\nआ यो विश्वा॑नि॒ शव॑सा त॒तानो॑पश्रो॒ता म॒ ईव॑तो॒ वचां॑सि ॥१॥\nअया॑मि॒ घोष॑ इन्द्र दे॒वजा॑मिरिर॒ज्यन्त॒ यच्छु॒रुधो॒ विवा॑चि ।\nन॒हि स्वमायु॑श्चिकि॒ते जने॑षु॒ तानीदंहां॒स्यति॑ पर्ष्य॒स्मान्॥२॥\nयु॒जे रथं॑ ग॒वेष॑णं॒ हरि॑भ्या॒मुप॒ ब्रह्मा॑णि जुजुषा॒णम॑स्थुः ।\nवि बा॑धिष्ट स्य रोद॑सी महि॒त्वेन्द्रो॑ वृ॒त्राण्य॑प्र॒ती ज॑घ॒न्वान्॥३॥\nआप॑श्चित् पिप्यु स्त॒र्यो॒३ न गावो॒ नक्ष॑न्नृ॒तं ज॑रि॒तार॑स्त इन्द्र ।\nया॒हि वा॒युर्न नि॒युतो॑ नो॒ अच्छा॒ त्वं हि धी॒भिर्दय॑से॒ वि वाजा॑न्॥४॥\nते त्वा॒ मदा॑ इन्द्र मादयन्तु शु॒ष्मिणं॑ तुवि॒राध॑सं जरि॒त्रे।\nएको॑ देव॒त्रा दय॑से॒ हि मर्ता॑न॒स्मिन्छू॑र॒ सव॑ने मादयस्व ॥५॥\nए॒वेदिन्द्रं॒ वृष॑णं॒ वज्र॑बाहुं॒ वसि॑ष्ठासो अ॒भ्यर्चन्त्य॒र्कैः ।\nस न॑ स्तु॒तो वी॒रव॑द् धातु॒ गोम॑द् यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥६॥\nऋ॒जी॒षी व॒ज्री वृ॑ष॒भस्तु॑रा॒षाट्छु॒ष्मी राजा॑ वृत्र॒हा सो॑म॒पावा॑ ।\nयु॒क्त्वा हरि॑भ्या॒मुप॑ यासद॒र्वाङ् माध्यं॑दिने॒ सव॑ने मत्स॒दिन्द्रः॑ ॥७॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 13,
"text": "(१-४) १ वामदेवः, २ गोतमः, ३ कुत्सः, ४ विश्वामित्रः। १ इन्द्राबृहस्पतिः, २ मरुतः, ३-४ अग्निः। १-३ जगती, ४ त्रिष्टुप्।\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 14,
"text": "१-४ सोभरिः। इन्द्रः। प्रगाथः (विषमा ककुम्+समा सतोबृहती)\nव॒यमु॒ त्वाम॑पूर्व्य स्थू॒रं न कच्चि॒द् भर॑न्तोऽव॒स्यवः॑ ।\nवाजे॑ चि॒त्रं ह॑वामहे ॥१॥\nउप॑ त्वा॒ कर्म॑न्नू॒तये॒ स नो॒ युवो॒ग्रश्च॑क्राम॒ यो धृ॒षत्।\nत्वामिद्ध्य॑वि॒तारं॑ ववृ॒महे॒ सखा॑य इन्द्र सान॒सिम्॥२॥\nयो न॑ इ॒दमि॑दं पु॒रा प्र वस्य॑ आनि॒नाय॒ तमु॑ व स्तुषे ।\nसखा॑य॒ इन्द्र॑मू॒तये॑ ॥३॥\nहर्य॑श्वं॒ सत्प॑तिं चर्षणी॒सहं॒ स हि ष्मा॒ यो अम॑न्दत ।\nआ तु नः॒ स व॑यति॒ गव्य॒मश्व्यं॑ स्तो॒तृभ्यो॑ म॒घवा॑ श॒तम्॥४॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 15,
"text": "१-६गोतमः। इन्द्रः। त्रिष्टुप्।\nप्र मंहि॑ष्ठाय बृह॒ते बृ॒हद्र॑ये स॒त्यशु॑ष्माय त॒वसे॑ म॒तिं भ॑रे ।\nअ॒पामि॑व प्रव॒णे यस्य॑ दु॒र्धरं॒ राधो॑ वि॒श्वायु॒ शव॑से॒ अपा॑वृतम्॥१॥\nअध॑ ते॒ विश्व॒मनु॑ हासदि॒ष्टय॒ आपो॑ नि॒म्नेव॒ सव॑ना ह॒विष्म॑तः ।\nयत् पर्व॑ते॒ न स॒मशी॑त हर्य॒त इन्द्र॑स्य॒ वज्रः॒ श्नथि॑ता हिर॒ण्ययः॑ ॥२॥\nअ॒स्मै भी॒माय॒ नम॑सा॒ सम॑ध्व॒र उषो॒ न शु॑भ्र॒ आ भ॑रा॒ पनी॑यसे ।\nयस्य॒ धाम॒ श्रव॑से॒ नामे॑न्द्रि॒यं ज्योति॒रका॑रि ह॒रितो॒ नाय॑से ॥३॥\nइ॒मे त॑ इन्द्र॒ ते व॒यं पु॑रुष्टुत॒ ये त्वा॒रभ्य॒ चरा॑मसि प्रभूवसो ।\nन॒हि त्वद॒न्यो गि॑र्वणो॒ गिरः॒ सध॑त् क्षो॒णीरि॑व॒ प्रति॑ नो हर्य॒ तद् वचः॑ ॥४॥\nभूरि॑ त इन्द्र वी॒र्यं॑१ तव॑ स्मस्य॒स्य स्तो॒तुर्म॑घव॒न् काम॒मा पृ॑ण ।\nअनु॑ ते॒ द्यौर्बृ॑ह॒ती वी॒र्यं मम इ॒यं च॑ ते पृथि॒वी ने॑म॒ ओज॑से ॥५॥\nत्वं तमि॑न्द्र॒ पर्व॑तं म॒हामु॒रुं वज्रे॑ण वज्रिन् पर्व॒शश्च॑कर्तिथ ।\nअवा॑सृजो॒ निवृ॑ताः॒ सर्त॒वा अ॒पः स॒त्रा विश्वं॑ दधिषे॒ केव॑लं॒ सहः॑ ॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 16,
"text": "१-१२ अयास्यः। बृहस्पतिः। त्रिष्टुप्।\nउ॒द॒प्रुतो॒ न वयो॒ रक्ष॑माणा॒ वाव॑दतो अ॒भ्रिय॑स्येव॒ घोषाः॑ ।\nगि॒रि॒भ्रजो॒ नोर्मयो॒ मद॑न्तो॒ बृह॒स्पति॑म॒भ्य॑१र्का अ॑नावन्॥१॥\nसं गोभि॑रङ्गिर॒सो नक्ष॑माणो॒ भग॑ इ॒वेद॑र्य॒मणं॑ निनाय ।\nजने॑ मि॒त्रो न दम्प॑ती अनक्ति॒ बृह॑स्पते वा॒जया॒शूंरि॑वा॒जौ॥२॥\nसा॒ध्व॒र्या अ॑ति॒थिनी॑रिषि॒रा स्पा॒र्हाः सु॒वर्णा॑ अनव॒द्यरू॑पाः ।\nबृह॒स्पतिः॒ पर्व॑तेभ्यो वि॒तूर्या॒ निर्गा ऊ॑पे॒ यव॑मिव स्थि॒विभ्यः॑ ॥३॥\nआ॒प्रु॒षा॒यन् मधु॑न ऋ॒तस्य॒ योनि॑मवक्षि॒पन्न॒र्क उ॒ल्कामि॑व॒ द्योः ।\nबृह॒स्पति॑रु॒द्धर॒न्नश्म॑नो॒ गा भूम्या॑ उ॒द्नेव॒ वि त्वचं॑ बिभेद ॥४॥\nअप॒ ज्योति॑षा॒ तमो॑ अ॒न्तरि॑क्षादु॒द्नः शीपा॑लमिव॒ वात॑ आजत्।\nबृह॒स्पति॑रनु॒मृश्या॑ व॒लस्या॒भ्रमि॑व॒ वात॒ आ च॑क्र॒ आ गाः ॥५॥\nय॒दा व॒लस्य॒ पीय॑तो॒ जसुं॒ भेद् बृह॒स्पति॑रग्नि॒तपो॑भिर॒र्कैः ।\nद॒द्भिर्न जि॒ह्वा परि॑विष्ट॒माद॑दा॒विर्नि॒धींर॑कृणोदु॒स्रिया॑णाम्॥६॥\nबृह॒स्पति॒रम॑त॒ हि त्यदा॑सां॒ नाम॑ स्व॒रीणां॒ सद॑ने॒ गुहा॒ यत्।\nआ॒ण्डेव॑ भि॒त्वा श॑कु॒नस्य॒ गर्भ॒मुदु॒स्रियाः॒ पर्व॑तस्य॒ त्मना॑जत्॥७॥\nअश्नापि॑नद्धं॒ मधु॒ पर्य॑पश्य॒न्मत्स्यं॒ न दी॒न उ॒दनि॑ क्षि॒यन्त॑म्।\nनिष्टज्ज॑भार चम॒सं न वृ॒क्षाद् बृह॒स्पति॑र्विर॒वेणा॑ वि॒कृत्य॑ ॥८॥\nसोषाम॑विन्द॒त् स स्वः॑१ सो अ॒ग्निं सो अ॒र्केण॒ वि ब॑बाधे॒ तमां॑सि ।\nबृह॒स्पति॒र्गोव॑पुषो व॒लस्य॒ निर्म॒ज्जानं॒ न पर्व॑णो जभार ॥९॥\nहि॒मेव॑ प॒र्णा मु॑षि॒ता वना॑नि॒ बृह॒स्पति॑नाकृपयद् व॒लो गाः ।\nअ॒ना॒नु॒कृ॒त्यम॑पु॒नश्च॑कार॒ यात् सूर्या॒मासा॑ मि॒थ उ॒च्चरा॑तः ॥१०॥\nअ॒भि श्या॒वं न कृश॑नेभि॒रश्वं॒ नक्ष॑त्रेभिः पि॒तरो॒ द्याम॑पिंशन्।\nरात्र्यां॒ तमो॒ अद॑धु॒र्ज्योति॒रह॒न् बृह॒स्पति॑र्भि॒नदद्रिं॑ वि॒दद् गाः ॥११॥\nइ॒दम॑कर्म॒ नमो॑ अभ्रि॒याय॒ यः पू॒र्वीरन्वा॒नोन॑वीति ।\nबृह॒स्पतिः॒ स हि गोभिः॒ सो अश्वैः॒ स वी॒रेभिः॒ स नृभि॑र्नो॒ वयो॑ धात्॥१२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 17,
"text": "(१-१२) १-११ कृष्णः, १२ वसिष्ठः। इन्द्रः। १-१० जगती, ११-१२ त्रिष्टुप्।\nअच्छा॑ म॒ इन्द्रं॑ म॒तयः॑ स्व॒र्विदः॑ स॒ध्रीची॒र्विश्वा॑ उश॒तीर॑नूषत ।\nपरि॑ ष्वजन्ते॒ जन॑यो॒ यथा॒ पतिं॒ मर्यं॒ न शु॒न्ध्युं म॒घवा॑नमू॒तये॑ ॥१॥\nन घा॑ त्व॒द्रिगप॑ वेति मे॒ मन॒स्त्वे इत् कामं॑ पुरुहूत शिश्रय ।\nराजे॑व दस्म॒ नि ष॒दोऽधि॑ ब॒र्हिष्य॒स्मिन्त्सु सोमे॑व॒पान॑मस्तु ते ॥२॥\nवि॒षू॒वृदिन्द्रो॒ अमु॑तेरु॒त क्षु॒धः स इद् रा॒यो म॒घवा॒ वस्व॑ ईशते ।\nतस्येदि॒मे प्र॑व॒णे स॒प्त सिन्ध॑वो॒ वयो॑ वर्धन्ति वृष॒भस्य॑ शु॒ष्मिणः॑ ॥३॥\nवयो॒ न वृ॒क्षं सु॑पला॒शमास॑द॒न्त्सोमा॑स॒ इन्द्रं॑ म॒न्दिन॑श्चमू॒षदः॑ ।\nप्रैषा॒मनी॑कं॒ शव॑सा॒ दवि॑द्युतद् वि॒दत् स्व॑१र्मन॑वे॒ ज्योति॒रार्य॑म्॥४॥\nकृ॒तं न श्व॒घ्नी वि चि॑नोति॒ देव॑ने सं॒वर्गं॒ यन्म॒घवा॒ सूर्यं॒ जय॑त्।\nन तत् ते॑ अ॒न्यो अनु॑ वी॒र्यं शक॒न्न पु॑रा॒णो म॑घव॒न् नोत नूत॑नः ॥५॥\nविशं॑विशं म॒घवा॒ पर्य॑शायत॒ जना॑नां॒ धेना॑ अव॒चाक॑श॒द् वृषा॑ ।\nयस्याह॑ श॒क्रः सव॑नेषु॒ रण्य॑ति॒ स ती॒व्रैः सोमैः॑ सहते पृतन्य॒तः ॥६॥\nआपो॒ न सिन्धु॑म॒भि यत् स॒मक्ष॑र॒न्त्सोमा॑स॒ इन्द्रं॑ कु॒ल्या इ॑व ह्र॒दम्।\nवर्ध॑न्ति॒ विप्रा॒ महो॑ अस्य॒ साद॑ने॒ यवं॒ न वृ॒ष्टिर्दि॒व्येन॒ दानु॑ना ॥७॥\nवृषा॒ न क्रु॒द्धः प॑तय॒द् रजः॒स्वा यो अ॒र्यप॑त्नी॒रकृ॑णोदि॒मा अ॒पः ।\nस सु॑न्व॒ते म॒घवा॑ जी॒रदा॑न॒वेऽवि॑न्द॒ज्ज्योति॒र्मन॑वे ह॒विष्म॑ते ॥८॥\nउज्जा॑यतां पर॒शुज्योति॑षा स॒ह भू॒या ऋ॒तस्य॑ सु॒दुघा॑ पुराण॒वत्।\nवि रो॑चतामरु॒षो भा॒नुना॒ शुचिः॒ स्व॑१र्ण शु॒क्रं शु॑शुचीत॒ सत्प॑तिः ॥९॥\nगोभि॑ष्टरे॒माम॑तिं दु॒रेवां॒ यवे॑न॒ क्षुधं॑ पुरुहूत॒ विश्वा॑म्।\nव॒यं राज॑भिः प्रथ॒मा धना॑न्य॒स्माके॑न वृ॒जने॑ना जयेम ॥१०॥\nबृह॒स्पति॑र्नः॒ परि॑ पातु प॒श्चादु॒तोत्त॑रस्मा॒दध॑रादघा॒योः ।\nइन्द्रः॑ पु॒रस्ता॑दु॒त म॑ध्य॒तो नः॒ सखा॒ सखि॑भ्यो॒ वरि॑वः कृणोतु ॥११॥\nबृह॑स्पते यु॒वमिन्द्र॑श्च॒ वस्वो॑ दि॒व्यस्ये॑शाथे उ॒त पार्थि॑वस्य ।\nध॒त्तं र॒यिं स्तु॑व॒ते की॒रये॑ चिद् यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥१२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 18,
"text": "(१-६) १-३ मेधातिथिः प्रियमेधाश्च, ४-६ वसिष्ठः। इन्द्रः। गायत्री।\nव॒यमु॑ त्वा त॒दित॑र्था॒ इन्द्र॑ त्वा॒यन्तः॒ सखा॑यः । कण्वा॑ उ॒क्थेभि॑र्जरन्ते ॥१॥\nन घे॑म॒न्यदा प॑पन॒ वज्रि॑न्न॒पसो॒ नवि॑ष्टौ । तवेदु॒ स्तोमं॑ चिकेत ॥२॥\nइ॒च्छन्ति॑ दे॒वाः सु॒न्वन्तं॒ न स्वप्ना॑य स्पृहयन्ति । यन्ति॑ प्र॒माद॒मत॑न्द्राः ॥३॥\nव॒यमि॑न्द्र त्वा॒यवो॒ऽभि प्र णो॑नुमो वृषन्। वि॒द्धि त्व॑१स्य नो॑ वसो ॥४॥\nमा नो॑ नि॒दे च॒ वक्त॑वे॒ऽर्यो र॑न्धी॒ररा॑व्णे । त्वे अपि॒ क्रतु॒र्मम॑ ॥५॥\nत्वं वर्मा॑सि स॒प्रथः॑ पुरोयो॒धश्च॑ वृत्रहन्। त्वया॒ प्रति॑ ब्रुवे यु॒जा॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 19,
"text": "१-७ विश्वामित्रः। इन्द्रः। गायत्री।\nवार्त्र॑हत्याय॒ शव॑से पृतना॒षाह्या॑य च । इन्द्र॒ त्वा व॑र्तयामसि ॥१॥\nअ॒र्वा॒चीनं॒ सु ते॒ मन॑ उ॒त चक्षुः॑ शतक्रतो । इन्द्र॑ कृ॒ण्वन्तु॑ वा॒घतः॑ ॥२॥\nनामा॑नि ते शतक्रतो॒ विश्वा॑भिर्गी॒र्भिरी॑महे । इन्द्रा॑भिमाति॒षाह्ये॑ ॥३॥\nपु॒रु॒ष्टु॒तस्य॒ धाम॑भिः श॒तेन॑ महयामसि । इन्द्र॑स्य चर्षणी॒धृतः॑ ॥४॥\nइन्द्रं॑ वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे पुरुहू॒तमुप॑ ब्रुवे । भरे॑षु॒ वाज॑सातये ॥५॥\nवाजे॑षु सास॒हिर्भ॑व॒ त्वामी॑महे शतक्रतो । इन्द्र॑ वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे ॥६॥\nद्यु॒म्नेषु॑ पृत॒नाज्ये॑ पृ॒त्सु॒तूर्षु॒ श्रवः॑सु च । इन्द्र॒ साक्ष्वा॒भिमा॑तिषु ॥७॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 20,
"text": "(१-७) १-४ विश्वामित्रः, ५-७ गृत्समदः। इन्द्रः। गायत्री।\nशु॒ष्मिन्त॑मं न ऊ॒तये॑ द्यु॒म्निनं॑ पाहि॒ जागृ॑विम्। इन्द्र॒ सोमं॑ शतक्रतो ॥१॥\nइ॒न्द्रि॒याणि॑ शतक्रतो॒ या ते॒ जने॑षु प॒ञ्चसु॑ । इन्द्र॒ तानि॑ त॒ आ वृ॑णे ॥२॥\nअग॑न्निन्द्र॒ श्रवो॑ बृ॒हद् द्यु॒म्नं द॑धिष्व दु॒ष्टर॑म्। उत् ते॒ शुष्मं॑ तिरामसि ॥३॥\nअ॒र्वा॒वतो॑ न॒ आ ग॒ह्यथो॑ शक्र परा॒वतः॑ ।\nउ॒ लो॒को यस्ते॑ अद्रिव॒ इन्द्रे॒ह तत॒ आ ग॑हि ॥४॥\nइन्द्रो॑ अ॒ङ्गं म॒हद् भ॒यम॒भी षदप॑ चुच्यवत्। स हि स्थि॒रो विच॑र्षणिः ॥५॥\nइन्द्र॑श्च मृ॒लया॑ति नो॒ न नः॑ प॒श्चाद॒घं न॑शत्। भ॒द्रं भ॑वाति नः पु॒रः ॥६॥\nइन्द्र॒ आशा॑भ्य॒स्परि॒ सर्वा॑भ्यो॒ अभ॑यं करत्।जेता॒ शत्रू॑न् विच॑र्षणिः ॥७॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 21,
"text": "१-११ सव्यः। इन्द्रः। जगती, १०-११ त्रिष्टुप्।\nन्यू॒३षु वाचं॒ प्र म॒हे भ॑रामहे॒ गिर॒ इन्द्रा॑य॒ सद॑ने वि॒वस्व॑तः ।\nनू चि॒द्धि रत्नं॑ सस॒तामि॒वावि॑द॒न्न दु॑ष्टु॒तिर्द्र॑विणो॒देषु॑ शस्यते ॥१॥\nदु॒रो अश्व॑स्य दु॒र इ॑न्द्र॒ गोर॑सि दु॒रो यव॑स्य॒ वसु॑न इ॒नस्पतिः॑ ।\nशि॒क्षा॒न॒रः प्र॒दिवो॒ अका॑मकर्शनः॒ सखा॒ सखि॑भ्य॒स्तमि॒दं गृ॑णीमसि ॥२॥\nशची॑व इन्द्र पुरुकृद् द्युमत्तम॒ तवेदि॒दम॒भित॑श्चेकिते॒ वसु॑ ।\nअतः॑ सं॒गृभ्या॑भिभूत॒ आ भ॑र॒ मा त्वा॑य॒तो ज॑रि॒तुः काम॑मूनयीः ॥३॥\nए॒भिर्द्युभिः॑ सु॒मना॑ ए॒भिरिन्दु॑भिर्निरुन्धा॒नो अम॑तिं॒ गोभि॑र॒श्विना॑ ।\nइन्द्रे॑ण॒ दस्युं॑ द॒रय॑न्त॒ इन्दु॑भिर्यु॒तद्वे॑षसः॒ समि॒षा र॑भेमहि ॥४॥\nसमि॑न्द्र रा॒या समि॒षा र॑भेमहि॒ सं वाजे॑भिः पुरुश्च॒न्द्रैर॒भिद्यु॑भिः ।\nसं दे॒व्या प्रम॑त्या वी॒रशु॑ष्मया॒ गोअ॑ग्र॒याश्वा॑वत्या रभेमहि ॥५॥\nते त्वा॒ मदा॑ अमद॒न् तानि॒ वृष्ण्या॒ ते सोमा॑सो वृत्र॒हत्ये॑षु सत्पते ।\nयत् का॒रवे॒ दश॑ वृ॒त्राण्य॑प्र॒ति ब॒र्हिष्म॑ते॒ नि स॒हस्रा॑णि ब॒र्हयः॑ ॥६॥\nयु॒धा युध॒मुप॒ घेदे॑षि धृष्णु॒या पु॒रा पुरं॒ समि॒दं हं॒स्योज॑सा ।\nनम्या॒ यदि॑न्द्र॒ सख्या॑ परा॒वति॑ निब॒र्हयो॒ नमु॑चिं॒ नाम॑ मा॒यिन॑म्॥७॥\nत्वं कर॑ञ्जमु॒त प॒र्णयं॑ वधी॒स्तेजि॑ष्ठयातिथि॒ग्वस्य॑ वर्त॒नी।\nत्वं श॒ता वङ्गृ॑दस्याभिन॒त् पुरो॑ऽनानु॒दः परि॑षूता ऋ॒जिश्व॑ना ॥८॥\nत्वमे॒तां ज॑न॒राज्ञो॒ द्विर्दशा॑ब॒न्धुना॑ सु॒श्रव॑सोपज॒ग्मुषः॑ ।\nष॒ष्टिं स॒हस्रा॑ नव॒तिं नव॑ श्रु॒तो नि च॒क्रेण॒ रथ्या॑ दु॒ष्पदा॑वृणक्॥९॥\nत्वमा॑विथ सु॒श्रव॑सं॒ तवो॒तिभि॒स्तव॒ त्राम॑भिरिन्द्र॒ तूर्व॑याणम्।\nत्वम॑स्मै॒ कुत्स॑मतिथि॒ग्वमा॒युं म॒हे राज्ञे॒ यूने॑ अरन्धनायः ॥१०॥\nय उ॒दृची॑न्द्र दे॒वगो॑पाः॒ सखा॑यस्ते शि॒वत॑मा॒ असा॑म ।\nत्वां स्तो॑षाम॒ त्वया॑ सु॒वीरा॒ द्राघी॑य॒ आयुः॑ प्रत॒रं दधा॑नाः ॥११॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 22,
"text": "(१-६) १-३ त्रिशोकः, ४-६ प्रियमेधः। इन्द्रः। गायत्री।\nअ॒भि त्वा॑ वृषभा सु॒ते सु॒तं सृ॑जामि पी॒तये॑ । तृ॒म्पा व्यऽश्नुही॒ मद॑म्॥१॥\nमा त्वा॑ मू॒रा अ॑वि॒ष्यवो॒ मोप॒हस्वा॑न॒ आ द॑भन्। माकीं॑ ब्रह्म॒द्विषो॑ वनः ॥२॥\nइ॒ह त्वा॒ गोप॑रीणसा म॒हे म॑न्दन्तु॒ राध॑से । सरो॑ गौ॒रो यथा॑ पिब ॥३॥\nअ॒भि प्र गोप॑तिं गि॒रेन्द्र॑मर्च॒ यथा॑ वि॒दे। सू॒नुं स॒त्यस्य॒ सत्प॑तिम्॥४॥\nआ हर॑यः ससृज्रि॒रेऽरु॑षी॒रधि॑ ब॒र्हिषि॑ । यत्रा॒भि सं॒नवा॑महे ॥५॥\nइन्द्रा॑य॒ गाव॑ आ॒शिरं॑ दुदु॒ह्रे व॒ज्रिणे॒ मधु॑ । यत् सी॑मुपह्व॒रे वि॒दत्॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 23,
"text": "१-९ विश्वामित्रः। इन्द्रः। गायत्री।\nआ तू न॑ इन्द्र म॒द्र्यऽग्घुवा॒नः सोम॑पीतये । हरि॑भ्यां याह्यद्रिवः ॥१॥\nस॒त्तो होता॑ न ऋ॒त्विय॑स्तिस्ति॒रे ब॒र्हिरा॑नु॒षक्। अयु॑ज्रन् प्रा॒तरद्र॑यः ॥२॥\nइ॒मा ब्रह्म॑ ब्रह्मवाहः क्रि॒यन्त॒ आ ब॒र्हिः सी॑द । वी॒हि शू॑र पुरो॒लाश॑म्॥३॥\nरा॒र॒न्धि सव॑नेषु ण ए॒षु स्तोमे॑षु वृत्रहन्। उ॒क्थेष्वि॑न्द्र गिर्वणः ॥४॥\nम॒तयः॑ सोम॒पामु॒रुं रि॒हन्ति॒ शव॑स॒स्पति॑म्। इन्द्रं॑ व॒त्सं न मा॒तरः॑ ॥५॥\nस म॑न्दस्वा॒ ह्यन्ध॑सो॒ राध॑से त॒न्वा म॒हे। न स्तो॒तारं॑ नि॒दे क॑रः ॥६॥\nव॒यमि॑न्द्र त्वा॒यवो॑ ह॒विष्म॑न्तो जरामहे । उ॒त त्वम॑स्म॒युर्व॑सो ॥७॥\nमारे अ॒स्मद् वि मु॑मुचो॒ हरि॑प्रिया॒र्वाङ् या॑हि । इन्द्र॑ स्वधावो॒ मत्स्वे॒ह॥८॥\nअ॒र्वाञ्चं॑ त्वा सु॒खे रथे॒ वह॑तामिन्द्र के॒शिना॑ । घृ॒तस्नू॑ ब॒र्हिरा॒सदे॑ ॥९॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 24,
"text": "१-९ विश्वामित्रः। इन्द्रः। गायत्री।\nउप॑ नः सु॒तमा ग॑हि॒ सोम॑मिन्द्र॒ गवा॑शिरम्। हरि॑भ्यां॒ यस्ते॑ अस्म॒युः ॥१॥\nतमि॑न्द्र॒ मद॒मा ग॑हि बर्हि॒ष्ठां ग्राव॑भिः सु॒तम्। क॒विन्न्वऽस्य तृ॒प्णवः॑ ॥२॥\nइन्द्रमि॒त्था गिरो॒ ममाच्छा॑गुरिषि॒ता इ॒तः । आ॒वृते॒ सोम॑पीतये ॥३॥\nइन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये॒ स्तोमै॑रि॒ह ह॑वामहे । उ॒क्थेभिः॑ कु॒विदा॒गम॑त्॥४॥\nइन्द्र॒ सोमाः॑ सु॒ता इ॒मे तान् द॑धिष्व शतक्रतो । ज॒ठरे॑ वाजिनीवसो ॥५॥\nवि॒द्मा हि त्वा॑ धनंज॒यं वाजे॑षु दधृ॒षं क॑वे । अधा॑ ते सु॒म्नमी॑महे ॥६॥\nइ॒ममि॑न्द्र॒ गवा॑शिरं॒ यवा॑शिरं च नः पिब । आ॒गत्या॒ वृष॑भिः सु॒तम्॥७॥\nतुभ्येदि॑न्द्र॒ स्व ओ॒क्ये॒३ सोमं॑ चोदामि पी॒तये॑ । ए॒ष रा॑रन्तु ते हृ॒दि॥८॥\nत्वां सु॒तस्य॑ पी॒तये॑ प्र॒त्नमि॑न्द्र हवामहे । कु॒शि॒कासो॑ अव॒स्यवः॑ ॥९॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 25,
"text": "(१-७) १-५ गोतमः, ७ अष्टकः। इन्द्रः। जगती, ७ त्रिष्टुप्।\nअश्वा॑वति प्रथ॒मो गोषु॑ गच्छति सुप्रा॒वीरि॑न्द्र॒ मर्त्य॒स्तवो॒तिभिः॑ ।\nतमित् पृ॑णक्षि॒ वसु॑ना॒ भवी॑यसा॒ सिन्धु॒मापो॒ यथा॒भितो॒ विचे॑तसः ॥१॥\nआपो॒ न दे॒वीरुप॑ यन्ति हो॒त्रिय॑म॒वः प॑श्यन्ति॒ वित॑तं॒ यथा॒ रजः॑ ।\nप्रा॒चैर्दे॒वासः॒ प्र ण॑यन्ति देव॒युं ब्र॑ह्म॒प्रियं॑ जोषयन्ते व॒रा इ॑व ॥२॥\nअधि॒ द्वयो॑रदधा उ॒क्थ्यं॑१ वचो॑ य॒तस्रु॑चा मिथु॒ना या स॑प॒र्यतः॑ ।\nअसं॑यत्तो व्र॒ते ते॑ क्षेति॒ पुष्य॑ति भ॒द्रा श॒क्तिर्यज॑मानाय सुन्व॒ते॥३॥\nआदङ्गि॑राः प्रथ॒मं द॑धिरे॒ वय॑ इ॒द्धाग्न॑यः॒ शम्या॒ ये सु॑कृ॒त्यया॑ ।\nसर्वं॑ प॒णेः सम॑विन्दन्त॒ भोज॑न॒मश्वा॑वन्तं॒ गोम॑न्त॒मा प॒शुं नरः॑ ॥४॥\nय॒ज्ञैरथ॑र्वा प्रथ॒मः प॒थस्त॑ते॒ ततः॒ सूर्यो॑ व्रत॒पा वे॒न आज॑नि ।\nआ गा आ॑जदु॒शना॑ का॒व्यः सचा॑ य॒मस्य॑ जा॒तम॒मृतं॑ यजामहे ॥५॥\nब॒र्हिर्वा॒ यत् स्व॑प॒त्याय॑ वृ॒ज्यते॒ऽर्को वा॒ श्लोक॑मा॒घोष॑ते दि॒वि।\nग्रावा॒ यत्र॒ वद॑ति का॒रुरु॒क्थ्य॑१स्तस्येदिन्द्रो॑ अभिपि॒त्वेषु॑ रण्यति ॥६॥\nप्रोग्रां पी॒तिं वृष्ण॑ इयर्मि स॒त्यां प्र॒यै सु॒तस्य॑ हर्यश्व॒ तुभ्य॑म्।\nइन्द्र॒ धेना॑भिरि॒ह मा॑दयस्व धी॒भिर्विश्वा॑भिः॒ शच्या॑ गृणा॒नः ॥७॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 26,
"text": "योगे॑योगे त॒वस्त॑रं॒ वाजे॑वाजे हवामहे । सखा॑य॒ इन्द्र॑मू॒तये॑ ॥१॥\nआ घा॑ गम॒द् यदि॒ श्रव॑त् सह॒स्रिणी॑भिरू॒तिभिः॑ । वाजे॑भि॒रुप॑ नो॒ हव॑म्॥२॥\nअनु॑ प्र॒त्नस्यौक॑सो हु॒वे तु॑विप्र॒तिं नर॑म्। यं ते॒ पूर्वं॑ पि॒ता हु॒वे॥३॥\nयु॒ञ्जन्ति॑ ब्र॒ध्नम॑रु॒षं चर॑न्तं॒ परि॑ त॒स्थुषः॑ । रोच॑न्ते रोच॒ना दि॒वि॥४॥\nयु॒ञ्जन्त्य॑स्य॒ काम्या॒ हरी॒ विप॑क्षसा॒ रथे॑ । शोणा॑ धृ॒ष्णू नृ॒वाह॑सा ॥५॥\nके॒तुं कृ॒ण्वन्न॑के॒तवे॒ पेशो॑ मर्या अपे॒शसे॑ । समु॒षद्भि॑रजायथाः ॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 27,
"text": "यदि॑न्द्रा॒हं यथा॒ त्वमीशी॑य॒ वस्व॒ एक॒ इत्। स्तो॒ता मे॒ गोष॑खा स्यात्॥१॥\nशिक्षे॑यमस्मै॒ दित्से॑यं॒ शची॑पते मनी॒षिणे॑ । यद॒हं गोप॑तिः॒ स्याम्॥२॥\nधे॒नुष्ट॑ इन्द्र सू॒नृता॒ यज॑मानाय सुन्व॒ते। गामश्वं॑ पि॒प्युषी॑ दुहे ॥३॥\nन ते॑ व॒र्तास्ति॒ राध॑स॒ इन्द्र॑ दे॒वो न मर्त्यः॑ ।यद् दित्स॑सि स्तु॒तो म॒घम्॥४॥\nय॒ज्ञ इन्द्र॑मवर्धय॒द् यद् भूमिं॒ व्यव॑र्तयत्। च॒क्रा॒ण ओ॑प॒शं दि॒वि॥५॥\nवा॒वृ॒धा॒नस्य॑ ते व॒यं विश्वा॒ धना॑नि जि॒ग्युषः॑ । ऊ॒तिमि॒न्द्रा वृ॑णीमहे ॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 28,
"text": "व्य॑१न्तरि॑क्षमतिर॒न्मदे॒ सोम॑स्य रोच॒ना। इन्द्रो॒ यदभि॑नद् व॒लम्॥१॥\nउद् गा आ॑ज॒दङ्गि॑रोभ्य आ॒विष्कृ॒ण्वन् गुहा॑ स॒तीः । अ॒र्वाञ्चं॑ नुनुदे व॒लम्॥२॥\nइन्द्रे॑ण रोच॒ना दि॒वो दृ॒ल्हानि॑ दृंहि॒तानि॑ च । स्थि॒राणि॒ न प॑रा॒णुदे॑ ॥३॥\nअ॒पामू॒र्मिर्मद॑न्निव॒ स्तोम॑ इन्द्राजिरायते । वि ते॒ मदा॑ अराजिषुः ॥४॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 29,
"text": "त्वं हि स्तो॑म॒वर्ध॑न॒ इन्द्रास्यु॑क्थ॒वर्ध॑नः । स्तो॒तॄ॒णामु॒त भ॑द्र॒कृत्॥१॥\nइन्द्र॒मित् के॒शिना॒ हरी॑ सोम॒पेया॑य वक्षतः । उप॑ य॒ज्ञं सु॒राध॑सम्॥२॥\nअ॒पां फेने॑न॒ नमु॑चेः॒ शिर॑ इ॒न्द्रोद॑वर्तयः । विश्वा॒ यदज॑य॒ स्पृधः॑ ॥३॥\nमा॒याभि॑रु॒त्सिसृ॑प्सत॒ इन्द्र॒ द्यामा॒रुरु॑क्षतः । अव॒ दस्यूं॑रधूनुथाः ॥४॥\nअ॒सु॒न्वामि॑न्द्र सं॒सदं॒ विषू॑चीं॒ व्यनाशयः । सो॒म॒पा उत्त॑रो॒ भव॑न्॥५॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 30,
"text": "प्र ते॑ म॒हे वि॒दथे॑ शंसिषं॒ हरी॒ प्र ते॑ वन्वे व॒नुषो॑ हर्य॒तं मद॑म्।\nघृ॒तं न यो हरि॑भि॒श्चारु॒ सेच॑त॒ आ त्वा॑ विशन्तु॒ हरि॑वर्पसं॒ गिरः॑ ॥१॥\nहरिं॒ हि योनि॑म॒भि ये स॒मस्व॑रन् हि॒न्वन्तो॒ हरी॑ दि॒व्यं यथा॒ सदः॑ ।\nआ यं पृ॒णन्ति॒ हरि॑भि॒र्न धे॒नव॒ इन्द्रा॑य शू॒षं हरि॑वन्तमर्चत ॥२॥\nसो अ॑स्य॒ वज्रो॒ हरि॑तो॒ य आ॑य॒सो हरि॒र्निका॑मो॒ हरि॒रा गभ॑स्त्योः ।\nद्यु॒म्नी सु॑शि॒प्रो हरि॑मन्युसायक॒ इन्द्रे॒ नि रू॒पा हरि॑ता मिमिक्षिरे ॥३॥\nदि॒वि न के॒तुरधि॑ धायि हर्य॒तो वि॒व्यच॒द् वज्रो॒ हरि॑तो॒ न रंह्या॑ ।\nतु॒ददहिं हरि॑शिप्रो॒ य आ॑य॒सः स॒हस्र॑शोका अभवद्धरिंभ॒रः ॥४॥\nत्वंत्व॑महर्यथा॒ उप॑स्तुतः॒ पूर्वे॑भिरिन्द्र हरिकेश॒ यज्व॑भिः ।\nत्वं ह॑र्यसि॒ तव॒ विश्व॑मु॒क्थ्य॑१मसा॑मि॒ राधो॑ हरिजात हर्य॒तम्॥५॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 31,
"text": "ता व॒ज्रिणं॑ म॒न्दिनं॒ स्तोम्यं॒ मद॒ इन्द्रं॒ रथे॑ वहतो हर्य॒ता हरी॑ ।\nपु॒रूण्य॑स्मै॒ सव॑नानि॒ हर्य॑त॒ इन्द्रा॑य॒ सोमा॒ हर॑यो दधन्विरे ॥१॥\nअरं कामा॑य॒ हर॑यो दधन्विरे स्थि॒राय॑ हिन्व॒न् हर॑यो॒ हरी॑ तु॒रा।\nअर्व॑द्भि॒र्यो हरि॑भि॒र्जोष॒मीय॑ते॒ सो अ॑स्य॒ कामं॒ हरि॑वन्तमानशे ॥२॥\nहरि॑श्मशारु॒र्हरि॑केश आय॒सस्तु॑र॒स्पेये॒ यो ह॑रि॒पा अव॑र्धत ।\nअर्व॑द्भि॒र्यो हरि॑भिर्वा॒जिनी॑वसु॒रति॒ विश्वा॑ दुरि॒ता पारि॑ष॒द्धरी॑ ॥३॥\nस्रुवे॑व॒ यस्य॒ हरि॑णी विपे॒ततुः॒ शिप्रे॒ वाजा॑य॒ हरि॑णी॒ दवि॑ध्वतः ।\nप्र यत् कृ॒ते च॑म॒से मर्मृ॑ज॒द्धरी॑ पी॒त्वा मद॑स्य हर्य॒तस्यान्ध॑सः ॥४॥\nउ॒त स्म॒ सद्म॑ हर्य॒तस्य॑ प॒स्त्यो॒३रत्यो॒ न वाजं॒ हरि॑वां अचिक्रदत्।\nम॒ही चि॒द्धि धि॒षणाह॑र्य॒दोज॑सा बृ॒हद् वयो॑ दधिषे हर्य॒तश्चि॒दा॥५॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 32,
"text": "आ रोद॑सी॒ हर्य॑माणो महि॒त्वा नव्यं॑नव्यं हर्यसि॒ मन्म॒ नु प्रि॒यम्।\nप्र प॒स्त्यमसुर हर्य॒तं गोरा॒विष्कृ॑धि॒ हर॑ये॒ सूर्या॑य ॥१॥\nआ त्वा॑ ह॒र्यन्तं॑ प्र॒युजो॒ जना॑नां॒ रथे॑ वहन्तु॒ हरि॑शिप्रमिन्द्र ।\nपिबा॒ यथा॒ प्रति॑भृतस्य॒ मध्वो॒ हर्य॑न् य॒ज्ञं स॑ध॒मादे॒ दशो॑णिम्॥२॥\nअपाः॒ पूर्वे॑षां हरिवः सु॒ताना॒मथो॑ इ॒दं सव॑नं॒ केव॑लं ते ।\nम॒म॒द्धि सोमं॒ मधु॑मन्तमिन्द्र स॒त्रा वृ॑षं ज॒ठर॒ आ वृ॑षस्व ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 33,
"text": "अ॒प्सु धू॒तस्य॑ हरिवः॒ पिबे॒ह नृभिः॑ सु॒तस्य॑ ज॒ठरं॑ पृणस्व ।\nमि॒मि॒क्षुर्यमद्र॑य इन्द्र॒ तुभ्यं॒ तेभि॑र्वर्धस्व॒ मद॑मुक्थवाहः ॥१॥\nप्रोग्रां पी॒तिं वृष्ण॑ इयर्मि स॒त्यां प्र॒यै सु॒तस्य॑ हर्यश्व॒ तुभ्य॑म्।\nइन्द्र॒ धेना॑भिरि॒ह मा॑दयस्व धी॒भिर्विश्वा॑भिः॒ शच्या॑ गृणा॒नः ॥२॥\nऊ॒ती श॑चीव॒स्तव॑ वी॒र्येण॒ वयो॒ दधा॑ना उ॒शिज॑ ऋत॒ज्ञाः ।\nप्र॒जाव॑दिन्द्र॒ मनु॑षो दुरो॒णे त॒स्थुर्गृ॒णन्तः॑ सध॒माद्या॑सः ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 34,
"text": "यो जा॒त ए॒व प्र॑थ॒मो मन॑स्वान् दे॒वो दे॒वान् क्रतु॑ना प॒र्यभू॑षत्।\nयस्य॒ शुष्मा॒द् रोद॑सी॒ अभ्य॑सेतां नृ॒म्णस्य॑ म॒ह्ना स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥१॥\nयः पृ॑थि॒वीं व्यथ॑माना॒मदृं॑ह॒द् यः पर्व॑ता॒न् प्रकु॑पिताँ॒ अर॑म्णात्।\nयो अ॒न्तरि॑क्षं विम॒मे वरी॑यो॒ यो द्यामस्त॑भ्ना॒त् स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥२॥\nयो ह॒त्वा हि॒मरि॑णात् स॒प्त सिन्धू॒न् यो गा उ॒दाज॑दप॒धा व॒लस्य॑ ।\nयो अश्म॑नोर॒न्तर॒ग्निं ज॒जान॑ सं॒वृक् स॒मत्सु॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥३॥\nयेने॒मा विश्वा॒ च्यव॑ना कृ॒तानि॒ यो दासं वर्ण॒मध॑रं॒ गुहाकः॑ ।\nश्व॒घ्नीव॒ यो जि॑गी॒वां ल॒क्षमाद॑द॒र्यः पु॒ष्टानि॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥४॥\nयं स्मा॑ पृ॒च्छन्ति॒ कुह॒ सेति॒ घो॒रमु॒तेमा॑हु॒र्नैषो अ॒स्तीत्ये॑नम्।\nसो अ॒र्यः पु॒ष्टीर्विज॑ इ॒वा मि॑नाति॒ श्रद॑स्मै धत्त॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥५॥\nयो र॒ध्रस्य॑ चोदि॒ता यः कृ॒शस्य॒ यो ब्र॒ह्मणो॒ नाध॑मानस्य की॒रेः ।\nयु॒क्तग्रा॑व्णो॒ योऽवि॒ता सु॑शि॒प्रः सु॒तसो॑मस्य॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥६॥\nयस्याश्वा॑सः प्र॒दिशि॒ यस्य॒ गावो॒ यस्य॒ ग्रामा॒ यस्य॒ विश्वे॒ रथा॑सः ।\nयः सूर्यं॒ य उ॒षसं॑ ज॒जान॒ यो अ॒पां ने॒ता स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥७॥\nयं क्रन्द॑सी संय॒ती वि॒ह्वये॑ते॒ परेऽव॑रे उ॒भया॑ अ॒मित्राः॑ ।\nस॒मा॒नं चि॒द् रथ॑मातस्थि॒वांसा॒ नाना॑ हवेते॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥८॥\nयस्मा॒न्न ऋ॒ते वि॒जय॑न्ते॒ जना॑सो॒ यं युध्य॑माना॒ अव॑से॒ हव॑न्ते ।\nयो विश्व॑स्य प्रति॒मानं॑ ब॒भूव॒ यो अ॑च्युत॒च्युत् स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥९॥\nयः शश्व॑तो॒ मह्येनो॒ दधा॑ना॒नम॑न्यमानां॒छर्वा॑ ज॒घान॑ ।\nयः शर्ध॑ते॒ नानु॒ददा॑ति शृ॒ध्यां यो दस्यो॑र्ह॒न्ता स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥१०॥\nयः शम्ब॑रं॒ पर्व॑तेषु क्षि॒यन्तं॑ चत्वारिं॒श्यां श॒रद्य॒न्ववि॑न्दत्।\nओ॒जा॒यमा॑नं॒ यो अहिं॑ ज॒घान॒ दानुं॒ शया॑नं॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥११॥\nयः शम्ब॑रं प॒र्यत॑र॒त् कसी॑भि॒र्योऽचा॑रुका॒स्नापि॑बत् सु॒तस्य॑ ।\nअ॒न्तर्गि॒रौ यज॑मानं ब॒हुं जनं॒ यस्मि॒न्नामू॑र्छ॒त् स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥१२॥\nयः स॒प्तर॑श्मिर्वृष॒भस्तुवि॑ष्मान॒वासृ॑ज॒त् सर्त॑वे स॒प्त सिन्धू॑न्।\nयो रौ॑हि॒णमस्फु॑र॒द् वज्र॑बाहु॒र्द्यामा॒रोह॑न्तं॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥१३॥\nद्यावा॑ चिदस्मै पृथि॒वी न॑मेते॒ शुष्मा॑च्चिदस्य॒ पर्व॑ता भयन्ते ।\nयः सो॑म॒पा नि॑चि॒तो वज्र॑बाहु॒र्यो वज्र॑हस्तः॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥१४॥\nयः सु॒न्वन्त॒मव॑ति॒ यः पच॑न्तं॒ यः शंस॑न्तं॒ यः श॑शमा॒नमू॒ती।\nयस्य॒ ब्रह्म॒ वर्ध॑नं॒ यस्य॒ सोमो॒ यस्ये॒दं राधः॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥१५॥\nजा॒तो व्यख्यत् पि॒त्रोरु॒पस्थे॒ भुवो॒ न वे॑द जनि॒तुः पर॑स्य ।\nस्त॒वि॒ष्यमा॑णो॒ नो यो अ॒स्मद् व्र॒ता दे॒वानां॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥१६॥\nयः सोम॑कामो॒ हर्य॑श्वः सू॒रिर्यस्मा॒द् रेज॑न्ते॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ।\nयो ज॒घान॒ शम्ब॑रं॒ यश्च॒ शुष्णं॒ य ए॑कवी॒रः स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥१७॥\nयः सु॑न्व॒ते पच॑ते दु॒ध्र आ चि॒द् वाजं॒ दर्द॑र्षि॒ स किला॑सि स॒त्यः ।\nव॒यं त॑ इन्द्र वि॒श्वह॑ प्रि॒यासः॑ सु॒वीरा॑सो वि॒दथ॒मा व॑देम ॥१८॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 35,
"text": "अ॒स्मा इदु॒ प्र त॒वसे॑ तु॒राय॒ प्रयो॒ न ह॑र्मि॒ स्तोमं॒ माहि॑नाय ।\nऋची॑षमा॒याध्रि॑गव॒ ओह॒मिन्द्रा॑य॒ ब्रह्मा॑णि रा॒तत॑मा ॥१॥\nअ॒स्मा इदु॒ प्रय॑ इव॒ प्र यं॑सि॒ भरा॑म्याङ्गू॒षं बाधे॑ सुवृ॒क्ति।\nइन्द्रा॑य हृ॒दा मन॑सा मनी॒षा प्र॒त्नाय॒ पत्ये॒ धियो॑ मर्जयन्त ॥२॥\nअ॒स्मा इदु॒ त्यमु॑प॒मं स्व॒र्षां भरा॑म्याङ्गू॒षमा॒स्येऽन ।\nमंहि॑ष्ठ॒मच्छो॑क्तिभिर्मती॒नां सु॑वृ॒क्तिभिः॑ सू॒रिं वा॑वृ॒धध्यै॑ ॥३॥\nअ॒स्मा इदु॒ स्तोमं॒ सं हि॑नोमि॒ रथं॒ न तष्टे॑व॒ तत्सि॑नाय ।\nगिर॑श्च॒ गिर्वा॑हसे सुवृ॒क्तीन्द्रा॑य विश्वमि॒न्वं मेधि॑राय ॥४॥\nअ॒स्मा इदु॒ सप्ति॑मिव श्रव॒स्येन्द्रा॑या॒र्कं जु॒ह्वा॒३सम॑ञ्जे ।\nवी॒रं दा॒नौक॑सं व॒न्दध्यै॑ पु॒रां गू॒र्तश्र॑वसं द॒र्माण॑म्॥५॥\nअ॒स्मा इदु॒ त्वष्टा॑ तक्ष॒द् वज्रं॒ स्वप॑स्तमं स्व॒र्यं॑१ रणा॑य ।\nवृ॒त्रस्य॑ चिद् वि॒दद् येन॒ मर्म॑ तु॒जन्नीशा॑नस्तुज॒ता कि॑ये॒धाः ॥६॥\nअ॒स्येदु॑ मा॒तुः सव॑नेषु स॒द्यो म॒हः पि॒तुं प॑पि॒वां चार्वन्ना॑ ।\nमु॒षा॒यद् विष्णुः॑ पच॒तं सही॑या॒न् विध्य॑द् वरा॒हं ति॒रो अद्रि॒मस्ता॑ ॥७॥\nअ॒स्मा इदु॒ ग्नाश्चि॑द् दे॒वप॑त्नी॒रिन्द्रा॑या॒र्कम॑हि॒हत्य॑ ऊवुः ।\nपरि॒ द्यावा॑पृथि॒वी ज॑भ्र उ॒र्वी नास्य॒ ते म॑हि॒मानं॒ परि॑ ष्टः ॥८॥\nअ॒स्ये दे॒व प्र रि॑रिचे महि॒त्वं दि॒वस्पृ॑थि॒व्याः पर्य॒न्तरि॑क्षात्।\nस्व॒रालिन्द्रो॒ दम॒ आ वि॒श्वगू॑र्तः स्व॒रिरम॑त्रो ववक्षे॒ रणा॑य ॥९॥\nअ॒स्येदे॒व शव॑सा शु॒षन्तं॒ वि वृ॑श्च॒द् वज्रे॑ण वृ॒त्रमिन्द्रः॑ ।\nगा न व्रा॒णा अ॒वनी॑रमुञ्चद॒भि श्रवो॑ दा॒वने॒ सचे॑ताः ॥१०॥\nअ॒स्येदु॑ त्वे॒षसा॑ रन्त॒ सिन्ध॑वः॒ परि॒ यद् वज्रे॑ण सी॒मय॑च्छत्।\nई॒शा॒न॒कृद् दा॒शुषे॑ दश॒स्यन् तु॒र्वीत॑ये गा॒धं तु॒र्वणिः॑ कः ॥११॥\nअ॒स्मा इदु॒ प्र भ॑रा॒ तूतु॑जानो वृ॒त्राय॒ वज्र॒मीशा॑नः किये॒धाः ।\nगोर्न पर्व॒ वि र॑दा तिर॒श्चेष्य॒न्नर्णां॑स्य॒पां च॒रध्यै॑ ॥१२॥\nअ॒स्येदु॒ प्र ब्रू॑हि पू॒र्व्याणि॑ तु॒रस्य॒ कर्मा॑णि॒ नव्य॑ उ॒क्थैः ।\nयु॒धे यदि॑ष्णा॒न आयु॑धान्यृघा॒यमा॑णो निरि॒णाति॒ शत्रू॑न्॥१३॥\nअ॒स्येदु॑ भि॒या गि॒रय॑श्च दृ॒ल्हा द्यावा॑ च॒ भूमा॑ ज॒नुष॑स्तुजेते ।\nउपो॑ वे॒नस्य॒ जोगु॑वान ओ॒णिं स॒द्यो भु॑वद् वी॒र्याय नो॒धाः ॥१४॥\nअ॒स्मा इदु॒ त्यदनु॑ दाय्येषा॒मेको॒ यद् वव्ने भूरे॒रीशा॑नः ।\nप्रैत॑शं॒ सूर्ये॑ पस्पृधा॒नं सौव॑श्व्ये॒ सुष्वि॑माव॒दिन्द्रः॑ ॥१५॥\nए॒वा ते॑ हारियोजना सुवृ॒क्तीन्द्र॒ ब्रह्मा॑णि॒ गोत॑मासो अक्रन्।\nऐषु॑ वि॒श्वपे॑शसं॒ धियं॑ धाः प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सु॒र्जगम्यात्॥१६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 36,
"text": "य एक॒ इद्धव्य॑श्चर्षणी॒नामिन्द्रं॒ तं गी॒र्भिर॒भ्यर्च आ॒भिः ।\nयः पत्य॑ते वृष॒भो वृष्ण्या॑वान्त्स॒त्यः सत्वा॑ पुरुमा॒यः सह॑स्वान्॥१॥\nतमु॑ नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरो॒ नव॑ग्वाः स॒प्त विप्रा॑सो अ॒भि वा॒जय॑न्तः ।\nन॒क्ष॒द्दा॒भं ततु॑रिं पर्वते॒ष्ठामद्रो॑घवाचं म॒तिभिः॒ शवि॑ष्ठम्॥२॥\nतमी॑महे॒ इन्द्र॑मस्य रा॒यः पु॑रु॒वीर॑स्य नृ॒वतः॑ पुरु॒क्षोः ।\nयो अस्कृ॑धोयुर॒जरः॒ स्वऽर्वा॒न् तमा भ॑र हरिवो माद॒यध्यै॑ ॥३॥\nतन्नो॒ वि वो॑चो॒ यदि॑ ते पु॒रा चि॑ज्जरि॒तार॑ आन॒शुः सु॒म्नमि॑न्द्र ।\nकस्ते॑ भा॒गः किं वयो॑ दुध्र खिद्वः पुरु॑हूत पुरूवसोऽसुर॒घ्नः ॥४॥\nतं पृ॒च्छन्ती॒ वज्र॑हस्तं रथे॒ष्ठामिन्द्रं॒ वेपी॒ वक्व॑री॒ यस्य॒ नू गीः ।\nतु॒वि॒ग्रा॒भं तु॑विकू॒र्मिं र॑भो॒दां गा॒तुमि॑षे॒ नक्ष॑ते॒ तुम्र॒मच्छ॑ ॥५॥\nअ॒या ह॒ त्यं मा॒यया॑ वावृधा॒नं म॑नो॒जुवा॑ स्वतवः॒ पर्व॑तेन ।\nअच्यु॑ता चिद् वीलि॒ता स्वो॑जो रु॒जो वि दृ॒ह्ला धृ॑ष॒ता वि॑रप्शिन्॥६॥\nतं वो॑ धि॒या नव्य॑स्या॒ शवि॑ष्ठं प्र॒त्नं प्र॑त्न॒वत् प॑रितंस॒यध्यै॑ ।\nस नो॑ वक्षदनिमा॒नः सु॒वह्मेन्द्रो॒ विश्वा॒न्यति॑ दु॒र्गहा॑णि ॥७॥\nआ जना॑य॒ द्रुह्व॑णे॒ पार्थि॑वानि दि॒व्यानि॑ दीपयो॒ऽन्तरि॑क्षा ।\nतपा॑ वृषन् वि॒श्वतः॑ शो॒चिषा॒ तान् ब्र॑ह्म॒द्विषे॑ शोचय॒ क्षाम॒पश्च॑ ॥८॥\nभुवो॒ जन॑स्य दि॒व्यस्य॒ राजा॒ पार्थि॑वस्य॒ जग॑तस्त्वेषसंदृक्।\nधि॒ष्व वज्रं॒ दक्षि॑ण इन्द्र॒ हस्ते॒ विश्वा॑ अजुर्य दयसे॒ वि मा॒याः ॥९॥\nआ सं॒यत॑मिन्द्र णः स्व॒स्तिं श॑त्रु॒तूर्या॑य बृह॒तीममृ॑ध्राम्।\nयया॒ दासा॒न्यार्या॑णि वृ॒त्रा करो॑ वज्रिन्त्सु॒तुका॒ नाहु॑षाणि ॥१०॥\nस नो॑ नि॒युद्भिः॑ पुरुहूत वेधो वि॒श्ववा॑राभि॒रा ग॑हि प्रयज्यो ।\nन या अदे॑वो॒ वर॑ते॒ न दे॒व आभि॑र्याहि॒ तूय॒मा म॑द्र्य॒द्रिक्॥११॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 37,
"text": "यस्ति॒ग्मशृ॑ङ्गो वृष॒भो न भी॒मः एकः॑ कृ॒ष्टीश्च्य॒वय॑ति॒ प्र विश्वाः॑ ।\nयः शश्व॑तो॒ अदा॑शुषो॒ गय॑स्य प्रय॒न्तासि॒ सुष्वि॑तराय॒ वेदः॑ ॥१॥\nत्वं ह॒ त्यदि॑न्द्र॒ कुत्स॑मावः॒ शुश्रू॑षमाणस्त॒न्वा सम॒र्ये।\nदासं॒ यच्छुष्णं कुय॑वं॒ न्यऽस्मा॒ अर॑न्धय आर्जुने॒याय॒ शिक्ष॑न्॥२॥\nत्वं धृ॑ष्णो धृष॒ता वी॒तह॑व्यं॒ प्रावो॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑ सु॒दास॑म्।\nप्र पौरु॑कुत्सिं त्र॒सद॑स्युमावः॒ क्षेत्र॑साता वृत्र॒हत्ये॑षु पू॒रुम्॥३॥\nत्वं नृभि॑र्नृमणो दे॒ववी॑तौ॒ भूरी॑णि वृ॒त्रा ह॑र्यश्व हंसि ।\nत्वं नि दस्युं॒ चुमु॑रिं धुनिं॒ चास्वा॑पयो द॒भीत॑ये सु॒हन्तु॑ ॥४॥\nतव॑ च्यौ॒त्नानि॑ वज्रहस्त॒ तानि॒ नव॒ यत् पुरो॑ नव॒तिं च॑ स॒द्यः ।\nनि॒वेश॑ने शतत॒मावि॑वेषी॒रहं॑ च वृ॒त्रं नमु॑चिमु॒ताह॑न्॥५॥\nसना॒ ता त॑ इन्द्र॒ भोज॑नानि रा॒तह॑व्याय दा॒शुषे॑ सु॒दासे॑ ।\nवृष्णे॑ ते॒ हरी॒ वृष॑णा युनज्मि॒ व्यन्तु॒ ब्रह्मा॑णि पुरुशाक॒ वाज॑म्॥६॥\nमा ते॑ अ॒स्यां स॑हसाव॒न् परि॑ष्टाव॒घाय॑ भूम हरिवः परा॒दौ।\nत्राय॑स्व नोऽवृ॒केभि॒र्वरू॑थै॒स्तव॑ प्रि॒यासः॑ सू॒रिषु॑ स्याम ॥७॥\nप्रि॒यास॒ इत् ते॑ मघवन्न॒भिष्टौ॒ नरो॑ मदेम शर॒णे सखा॑यः ।\nनि तु॒र्वशं॒ नि याद्वं॑ शिशीह्यतिथि॒ग्वाय॒ शंस्यं॑ करि॒ष्यन्॥८॥\nस॒द्यश्चि॒न्नु ते॑ मघवन्न॒भिष्टौ॒ नरः॑ शंसन्त्युक्थ॒शास॑ उ॒क्था।\nये ते॒ हवे॑भि॒र्वि प॒णींरदा॑शन्न॒स्मान् वृ॑णीष्व॒ युज्या॑य॒ तस्मै॑ ॥९॥\nए॒ते स्तोमा॑ न॒रां नृ॑तम॒ तुभ्य॑मस्म॒द्र्यऽञ्चो॒ दद॑तो म॒घानि॑ ।\nतेषा॑मिन्द्र वृत्र॒हत्ये॑ शि॒वो भूः॒ सखा॑ च॒ शूरो॑ऽवि॒ता च॑ नृ॒णाम्॥१०॥\nनू इ॑न्द्र शूर॒ स्तव॑मान ऊ॒ती ब्रह्म॑जूतस्त॒न्वा वावृधस्व ।\nउप॑ नो॒ वाजा॑न् मिमी॒ह्युप॒ स्ती॑न् यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥११॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 38,
"text": "आ या॑हि सुषु॒मा हि त॒ इन्द्र॒ सोमं॒ पिबा॑ इ॒मम्। एदं ब॒र्हिः स॑दो॒ मम॑ ॥१॥\nआ त्वा॑ ब्रह्म॒युजा॒ हरी॒ वह॑तामिन्द्र के॒शिना॑ । उप॒ ब्रह्मा॑णि नः शृणु ॥२॥\nब्र॒ह्माण॑स्त्वा व॒यं यु॒जा सो॑म॒पामि॑न्द्र सो॒मिनः॑ । सु॒ताव॑न्तो हवामहे ॥३॥\nइन्द्र॒मिद् गा॒थिनो॑ बृ॒हदिन्द्र॑म॒र्केभि॑र॒र्किणः॑ । इन्द्रं॒ वाणी॑रनूषत ॥४॥\nइन्द्र॒ इद्धर्योः॒ सचा॒ संमि॑श्ल॒ आ व॑चो॒युजा॑ । इन्द्रो॑ व॒ज्री हि॑र॒ण्ययः॑ ॥५॥\nइन्द्रो॑ दी॒र्घाय॒ चक्ष॑स॒ आ सूर्यं॑ रोहयद् दि॒वि। वि गोभि॒रद्रि॑मैरयत्॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 39,
"text": "इन्द्रं॑ वो वि॒श्वत॒स्परि॒ हवा॑महे॒ जने॑भ्यः । अ॒स्माक॑मस्तु॒ केव॑लः ॥१॥\nव्य॑१न्तरि॑क्षमतिर॒न्मदे॒ सोम॑स्य रोच॒ना। इन्द्रो॒ यदभि॑नद् व॒लम्॥२॥\nउद् गा आ॑ज॒दङ्गि॑रोभ्य आ॒विष्कृ॒ण्वन् गुहा॑ स॒तीः । अ॒र्वाञ्चं॑ नुनुदे व॒लम्॥३॥\nइन्द्रे॑ण रोच॒ना दि॒वो दृ॒ल्हानि॑ दृंहि॒तानि॑ च । स्थि॒राणि॒ न प॑रा॒णुदे॑ ॥४॥\nअ॒पामू॒र्मिर्मद॑न्निव॒ स्तोम॑ इन्द्राजिरायते । वि ते॒ मदा॑ अराजिषुः ॥५॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 40,
"text": "इन्द्रे॑ण॒ सं हि दृक्ष॑से संजग्मा॒नो अबि॑भ्युषा। म॒न्दू स॑मा॒नव॑र्चसा ॥१॥\nअ॒न॒व॒द्यैर॒भिद्यु॑भिर्म॒खः सह॑स्वदर्चति । ग॒णैरिन्द्र॑स्य॒ काम्यैः॑ ॥२॥\nआदह॑ स्व॒धामनु॒ पुन॑र्गर्भ॒त्वमे॑रि॒रे। दधा॑ना॒ नाम॑ य॒ज्ञिय॑म्॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 41,
"text": "इन्द्रो॑ दधी॒चो अ॒स्थभि॑र्वृ॒त्राण्यप्र॑तिष्कुतः । ज॒घान॑ नव॒तीर्नव॑ ॥१॥\nइ॒च्छनश्व॑स्य॒ यच्छिरः॒ पर्वते॒ष्वप॑श्रितम्। तद् वि॑दच्छर्य॒णाव॑ति ॥२॥\nअत्राह॒ गोर॑मन्वत॒ नाम॒ त्वष्टु॑रपी॒च्यम्। इ॒त्था च॒न्द्रम॑सो गृ॒हे॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 42,
"text": "वाच॑म॒ष्टाप॑दीम॒हं नव॑स्रक्तिमृत॒स्पृश॑म्। इन्द्रा॒त् परि॑ त॒न्वं ममे ॥१॥\nअनु॑ त्वा॒ रोद॑सी उ॒भे क्रक्ष॑माणमकृपेताम्। इन्द्र॒ यद् द॑स्यु॒हाभ॑वः ॥२॥\nउ॒त्तिष्ठ॒न्नोज॑सा स॒ह पी॒त्वी शिप्रे॑ अवेपयः । सोम॑मिन्द्र च॒मू सु॒तम्॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 43,
"text": "भि॒न्धि विश्वा॒ अप॒ द्विषः॒ परि॒ बाधो॑ ज॒ही मृधः॑ । वसु॑ स्पा॒र्हं तदा भ॑र ॥१॥\nयद् वी॒लावि॑न्द्र॒ यत् स्थि॒रे यत् पर्शा॑ने॒ परा॑भृतम्। वसु॑ स्पा॒र्हं तदा भ॑र ॥२॥\nयस्य॑ ते वि॒श्वमा॑नुषो॒ भूरे॑र्द॒त्तस्य॒ वेद॑ति । वसु॑ स्पा॒र्हं तदा भ॑र ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 44,
"text": "प्र स॒म्राजं॑ चर्षणी॒नामिन्द्रं॑ स्तोता॒ नव्यं॑ गी॒र्भिः । नरं॑ नृ॒षाहं॒ मंहि॑ष्ठम्॥१॥\nयस्मि॑न्नु॒क्थानि॒ रण्य॑न्ति॒ विश्वा॑नि च श्रव॒स्य । अ॒पामवो॒ न स॑मु॒द्रे॥२॥\nतं सु॑ष्टु॒त्या वि॑वासे ज्येष्ठ॒राजं॒ भरे॑ कृ॒त्नुम्। म॒हो वा॒जिनं॑ स॒निभ्यः॑ ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 45,
"text": "अ॒यमु॑ ते॒ सम॑तसि क॒पोत॑ इव गर्भ॒धिम्। वच॒स्तच्चि॑न्न ओहसे ॥१॥\nस्तो॒त्रं रा॑धानां पते॒ गिर्वा॑हो वीर॒ यस्य॑ ते । विभू॑तिरस्तु सू॒नृता॑ ॥२॥\nऊ॒र्ध्वस्ति॑ष्ठा न ऊ॒तये॒ऽस्मिन् वाजे॑ शतक्रतो । सम॒न्येषु॑ ब्रवावहै ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 46,
"text": "प्र॒णे॒तारं॒ वस्यो॒ अच्छा॒ कर्ता॑रं॒ ज्योतिः॑ स॒मत्सु॑ । सा॒स॒ह्वांसं यु॒धामित्रा॑न्॥१॥\nस नः॒ पप्रिः॑ पारयाति स्व॒स्ति ना॒वा पु॑रुहू॒तः । इन्द्रो॒ विश्वा॒ अति॒ द्विषः॑ ॥२॥\nस त्वं न॑ इन्द्र॒ वाजे॑भिर्दश॒स्या च॑ गातु॒या च॑ । अच्छा॑ च नः सु॒म्नं ने॑षि ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 47,
"text": "तमिन्द्रं॑ वाजयामसि म॒हे वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे । स वृषा॑ वृष॒भो भु॑वत्॥१॥\nइन्द्रः॒ स दाम॑ने कृ॒त ओजि॑ष्ठः॒ स मदे॑ हि॒तः । द्यु॒म्नी श्लो॒की स सो॒म्यः ॥२॥\nगि॒रा वज्रो॒ न संभृ॑तः॒ सब॑लो॒ अन॑पच्युतः । व॒व॒क्ष ऋ॒ष्वो अस्तृ॑तः ॥३॥\nइन्द्र॒मिद् गा॒थिनो॑ बृ॒हदिन्द्र॑म॒र्केभि॑र॒र्किणः॑ । इन्द्रं॒ वाणी॑रनूषत ॥४॥\nइन्द्र॒ इद्धर्योः॒ सचा॒ संमि॑श्ल॒ आ व॑चो॒युजा॑ । इन्द्रो॑ व॒ज्री हि॑र॒ण्ययः॑ ॥५॥\nइन्द्रो॑ दी॒र्घाय॒ चक्ष॑स॒ आ सूर्यं॑ रोहयद् दि॒वि। वि गोभि॒रद्रि॑मैरयत्॥६॥\nआ या॑हि सुषु॒मा हि त॒ इन्द्र॒ सोमं॒ पिबा॑ इ॒मम्। एदं ब॒र्हिः स॑दो॒ मम॑ ॥७॥\nआ त्वा॑ ब्रह्म॒युजा॑ हरी॒ वह॑तामिन्द्र के॒शिना॑ । उप॒ ब्रह्मा॑णि नः शृणु ॥८॥\nब्र॒ह्माण॑स्त्वा व॒यं यु॒जा सो॑म॒पामि॑न्द्र सो॒मिनः॑ । सु॒ताव॑न्तो हवामहे ॥९॥\nयु॒ञ्जन्ति॑ ब्र॒ध्नम॑रु॒षं चर॑न्तं॒ परि॑ त॒स्थुषः॑ । रोच॑न्ते रोच॒ना दि॒वि॥१०॥\nयु॒ञ्जन्त्य॑स्य॒ काम्या॒ हरी॒ विप॑क्षसा॒ रथे॑ । शोणा॑ धृ॒ष्णू नृ॒वाह॑सा ॥११॥\nके॒तुं कृ॒ण्वन्न॑के॒तवे॒ पेशो॑ मर्या अपे॒शसे॑ । समु॒षद्भि॑रजायथाः ॥१२॥\nउदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तवः॑ । दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म्॥१३॥\nअप॒ त्ये ता॒यवो॑ यथा॒ नक्ष॑त्रा यन्त्य॒क्तुभिः॑ । सूरा॑य वि॒श्वच॑क्षसे ॥१४॥\nअदृ॑श्रन्नस्य के॒तवो॒ वि र॒श्मयो॒ जनां॒ अनु॑ । भ्राज॑न्तो अ॒ग्नयो॑ यथा ॥१५॥\nत॒रणि॑र्वि॒श्वद॑र्शतो ज्योति॒ष्कृद॑सि सूर्य । विश्व॒मा भा॑सि रोचन ॥१६॥\nप्र॒त्यङ् दे॒वानां॒ विशः॑ प्र॒त्यङ्ङुदे॑षि॒ मानु॑षीः । प्र॒त्यङ् विश्वं॒ स्वर्दृ॒शे॥१७॥\nयेना॑ पावक॒ चक्ष॑सा भुर॒ण्यन्तं॒ जनां॒ अनु॑ । त्वं व॑रुण॒ पश्य॑सि ॥१८॥\nवि द्यामे॑षि॒ रज॑स्पृ॒थ्वह॒र्मिमा॑नो अ॒क्तुभिः॑ । पश्यं॒ जन्मा॑नि सूर्य ॥१९॥\nस॒प्त त्वा॑ ह॒रितो॒ रथे॒ वह॑न्ति देव सूर्य । शो॒चिष्के॑शं विचक्ष॒णम्॥२०॥\nअयु॑क्त स॒प्त शु॒न्ध्युवः॒ सूरो॒ रथ॑स्य न॒प्त्यः । ताभि॑र्याति॒ स्वयु॑क्तिभिः ॥२१॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 48,
"text": "अ॒भि त्वा॒ वर्च॑सा गिरः॒ सिञ्च॑न्ती॒राच॑र॒ण्युवः॑ । अ॒भि व॒त्सं न धे॒नवः॑ ॥१॥\nता अ॑र्षन्ति शु॒भ्रियः॒ पृञ्च॑न्ती॒र्वर्च॑सा प्रि॒यः । जा॒तं जा॒त्रीर्यथा॑ हृ॒दा॥२॥\nवज्रा॑पव॒साध्यः॑ की॒र्तिर्म्रि॒यमा॑ण॒माव॑हन्।मह्य॒मायु॑र्घृ॒तं पयः॑ ॥३॥\nआयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒दस॑दन्मा॒तरं॑ पु॒रः । पि॒तरं॑ च प्र॒यन्त्स्वः ॥४॥\nअ॒न्तश्च॑रति रोच॒ना अ॒स्य प्रा॒णाद॑पान॒तः । व्य॑ख्यन्महि॒षः स्वः ॥५॥\nत्रिं॒शद् धामा॒ वि रा॑जति॒ वाक् प॑त॒ङ्गो अ॑शिश्रियत्। प्रति॒ वस्तो॒रह॒र्द्युभिः॑ ॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 49,
"text": "यच्छ॒क्रा वाच॒मारु॑हन्न॒न्तरि॑क्षं सिषासथः । सं दे॒वा अ॑मद॒न् वृषा॑ ॥१॥\nश॒क्रो वाच॒मधृ॑ष्टा॒योरु॑वाचो॒ अधृ॑ष्णुहि । मं॑हिष्ठ॒ आ म॑द॒र्दिवि॑ ॥२॥\nश॒क्रो वाच॒मधृ॑ष्णुहि॒ धाम॑धर्म॒न् विरा॑जति । विम॑दन् ब॒र्हिरा॒सर॑न्॥३॥\nतं वो॑ द॒स्ममृ॑ती॒षहं॒ वसो॑र्मन्दा॒नमन्ध॑सः ।\nअ॒भि व॒त्सं न स्वस॑रेषु धे॒नव॒ इन्द्रं॑ गी॒र्भिर्न॑वामहे ॥४॥\nद्यु॒क्षं सु॒दानुं॒ तवि॑षीभि॒रावृ॑तं गि॒रिं न पु॑रु॒भोज॑सम्।\nक्षु॒मन्तं॒ वाजं॑ श॒तिनं॑ सह॒स्रिणं॑ म॒क्षू गोम॑न्तमीमहे ॥५॥\nतत् त्वा॑ यामि सु॒वीर्यं॒ तद् ब्रह्म॑ पू॒र्वचि॑त्तये ।\nयेना॒ यति॑भ्यो॒ भृग॑वे॒ धने॑ हि॒ते येन॒ प्रस्क॑ण्व॒मावि॑थ ॥६॥\nयेना॑ समु॒द्रमसृ॑जो म॒हीर॒पस्तदि॑न्द्र॒ वृष्णि॑ ते॒ शवः॑ ।\nस॒द्यः सो अ॑स्य महि॒मा न सं॒नशे॒ यं क्षो॒णीर॑नुचक्र॒दे॥७॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 50,
"text": "कन्नव्यो॑ अत॒सीनां॑ तु॒रो गृ॑णीत॒ मर्त्यः॑ ।\nन॒ही न्व॑स्य महि॒मान॑मिन्द्रि॒यं स्वर्गृ॒णन्त॑ आन॒शुः ॥१॥\nकदु॑ स्तु॒वन्त॑ ऋतयन्त दे॒वत॒ ऋषिः॒ को विप्र॑ ओहते ।\nक॒दा हवं॑ मघवन्निन्द्र सुन्व॒तः कदु॑ स्तुव॒त आ ग॑मः ॥२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 51,
"text": "अ॒भि प्र वः॑ सु॒राध॑स॒मिन्द्र॑मर्च॒ यथा॑ वि॒दे।\nयो ज॑रि॒तृभ्यो॑ म॒घवा॑ पुरू॒वसुः॑ स॒हस्रे॑णेव॒ शिक्ष॑ति ॥१॥\nश॒तानी॑केव॒ प्र जि॑गाति धृष्णु॒या हन्ति॑ वृ॒त्राणि॑ दा॒शुषे॑ ।\nगि॒रेरि॑व॒ प्र रसा॑ अस्य पिन्विरे॒ दत्रा॑णि पुरु॒भोज॑सः ॥२॥\nप्र सु श्रु॒तं सु॒राध॑स॒मर्चा॑ श॒क्रम॒भिष्ट॑ये ।\nयः सु॑न्व॒ते स्तु॑व॒ते काम्यं॒ वसु॑ स॒हस्रे॑णेव॒ मंह॑ते ॥३॥\nश॒तानी॑का हे॒तयो॑ अस्य दु॒ष्टरा॒ इन्द्र॑स्य स॒मिषो॑ म॒हीः ।\nगि॒रिर्न भु॒ज्मा म॒घव॑त्सु पिन्वते॒ यदीं॑ सु॒ता अम॑न्दिषुः ॥४॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 52,
"text": "व॒यं घ॑ त्वा सु॒ताव॑न्त॒ आपो॒ न वृ॒क्तब॑र्हिषः ।\nप॒वित्र॑स्य प्र॒स्रव॑णेषु वृत्रह॒न् परि॑ स्तो॒तार॑ आसते ॥१॥\nस्वर॑न्ति त्वा सु॒ते नरो॒ वसो॑ निरे॒क उ॒क्थिनः॑ ।\nक॒दा सु॒तं तृ॑षा॒ण ओक॒ आ ग॑म॒ इन्द्र॑ स्व॒ब्दीव॒ वंस॑गः ॥२॥\nकण्वे॑भिर्धृष्ण॒वा धृ॒षद् वाजं॑ दर्षि सह॒स्रिण॑म्।\nपि॒शङ्ग॑रूपं मघवन् विचर्षणे म॒क्षू गोम॑न्तमीमहे ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 53,
"text": "क ईं॑ वेद सु॒ते सचा॒ पिब॑न्तं॒ कद् वयो॑ दधे ।\nअ॒यं यः पुरो॑ विभि॒नत्त्योज॑सा मन्दा॒नः शि॒प्र्यन्ध॑सः ॥१॥\nदा॒ना मृ॒गो न वा॑र॒णः पु॑रु॒त्रा च॒रथं॑ दधे ।\nनकि॑ष्ट्वा॒ नि य॑म॒दा सु॒ते ग॑मो म॒हाश्च॑र॒स्योज॑सा ॥२॥\nय उ॒ग्रः सन्ननि॑ष्टृत स्थि॒रो रणा॑य॒ संस्कृ॑तः ।\nयदि॑ स्तो॒तुर्म॒घवा॑ शृ॒णव॒द्धवं॒ नेन्द्रो॑ योष॒त्या ग॑मत्॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 54,
"text": "विश्वाः॒ पृत॑ना अभि॒भूत॑रं॒ नरं॑ स॒जूस्त॑तक्षु॒रिन्द्रं॑ जज॒नुश्च॑ रा॒जसे॑ ।\nक्रत्वा॒ वरि॑ष्ठं॒ वर॑ आ॒मुरि॑मु॒तोग्रमोजि॑ष्ठं त॒वसं॑ तर॒स्विन॑म्॥१॥\nसमीं॑ रे॒भासो॑ अस्वर॒न्निन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये॑ ।\nस्वर्पतिं॒ यदीं॑ वृ॒धे धृ॒तव्र॑तो॒ ह्योज॑सा॒ समू॒तिभिः॑ ॥२॥\nने॒मिं न॑मन्ति॒ चक्ष॑सा मे॒षं विप्रा॑ अभि॒स्वरा॑ ।\nसु॒दी॒तयो॑ वो अ॒द्रुहोऽपि॒ कर्णे॑ तर॒स्विनः॒ समृक्व॑भिः ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 55,
"text": "तमिन्द्रं॑ जोहवीमि म॒घवा॑नमु॒ग्रं स॒त्रा दधा॑न॒मप्र॑तिष्कुतं॒ शवांसि ।\nमंहि॑ष्ठो गी॒र्भिरा च॑ य॒ज्ञियो॑ व॒वर्त॑द् रा॒ये नो॒ विश्वा॑ सु॒पथा॑ कृणोतु व॒ज्री॥१॥\nया इ॑न्द्र॒ भुज॒ आभ॑रः॒ स्वर्वां॒ असु॑रेभ्यः ।\nस्तो॒तार॒मिन्म॑घवन्नस्य वर्धय॒ ये च॒ त्वे वृ॒क्तब॑र्हिषः ॥२॥\nयमि॑न्द्र दधि॒षे त्वमश्वं॒ गां भा॒गमव्य॑यम्।\nयज॑माने सुन्व॒ति दक्षि॑णावति॒ तस्मि॒न् तं धे॑हि॒ मा प॒णौ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 56,
"text": "इन्द्रो॒ मदा॑य वावृधे॒ शव॑से वृत्र॒हा नृभिः॑ ।\nतमिन्म॒हत्स्वा॒जिषू॒तेमर्भे॑ हवामहे॒ स वाजे॑षु॒ प्र नो॑ऽविषत्॥१॥\nअसि॒ हि वी॑र॒ सेन्योऽसि॒ भूरि॑ पराद॒दिः ।\nअसि॑ द॒भ्रस्य॑ चिद् वृ॒धो यज॑मानाय शिक्षसि सुन्व॒ते भूरि॑ ते॒ वसु॑ ॥२॥\nयदु॒दीर॑त आ॒जयो॑ धृ॒ष्णवे॑ धीयते॒ धना॑ ।\nयु॒क्ष्वा म॑द॒च्युता॒ हरी॒ कं हनः॒ कं वसौ॑ दधो॒ऽस्मां इ॑न्द्र॒ वसौ॑ दधः ॥३॥\nमदे॑मदे॒ हि नो॑ द॒दिर्यू॒था गवा॑मृजु॒क्रतुः॑ ।\nसं गृ॑भाय पु॒रु श॒तोभ॑याह॒स्त्या वसु॑ शिशी॒हि रा॒य आ भ॑र ॥४॥\nमा॒दय॑स्व सु॒ते सचा॒ शव॑से शूर॒ राध॑से ।\nवि॒द्मा हि त्वा॑ पुरू॒वसु॒मुप॒ कामा॑न्त्ससृ॒ज्महेऽथा॑ नोऽवि॒ता भ॑व ॥५॥\nए॒ते त॑ इन्द्र ज॒न्तवो॒ विश्वं॑ पुष्यन्ति॒ वार्य॑म्।\nअ॒न्तर्हि ख्यो जना॑नाम॒र्यो वेदो॒ अदा॑शुषां॒ तेषां॑ नो॒ वेद॒ आ भ॑र ॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 57,
"text": "सु॒रू॒प॒कृ॒त्नुमू॒तये॑ सु॒दुघा॑मिव गो॒दुहे॑ ।जु॒हूमसि॒ द्यवि॑द्यवि ॥१॥\nउप॑ नः॒ सव॒ना ग॑हि॒ सोम॑स्य सोमपाः पिब । गो॒दा इद् रे॒वतो॒ मदः॑ ॥२॥\nअथा॑ ते॒ अन्त॑मानां वि॒द्याम॑ सुमती॒नाम्। मा नो॒ अति॑ ख्य॒ आ ग॑हि ॥३॥\nशु॒ष्मिन्त॑मं न ऊ॒तये॑ द्यु॒म्निनं॑ पाहि॒ जागृ॑विम्। इन्द्र॒ सोमं॑ शतक्रतो ॥४॥\nइ॒न्द्रि॒याणि॑ शतक्रतो॒ या ते॒ जने॑षु प॒ञ्चसु॑ । इन्द्र॒ तानि॑ त॒ आ वृ॑णे ॥५॥\nअग॑न्निन्द्र॒ श्रवो॑ बृ॒हद् द्यु॒म्नं द॑धिष्व दु॒ष्टर॑म्। उत् ते॒ शुष्मं॑ तिरामसि ॥६॥\nअ॒र्वा॒वतो॑ न॒ आ ग॒ह्यथो॑ शक्र परा॒वतः॑ । उ॒ लो॒को यस्ते॑ अद्रिव॒ इन्द्रे॒ह तत॒ आ ग॑हि ॥७॥\nइन्द्रो॑ अ॒ङ्ग म॒हद् भ॒यम॒भी षदप॑ चुच्यवत्। स हि स्थि॒रो विच॑र्षणिः ॥८॥\nइन्द्र॑श्च मृ॒लया॑ति नो॒ न नः॑ प॒श्चाद॒घं न॑शत्। भ॒द्रं भ॑वाति नः पु॒रः ॥९॥\nइन्द्र॒ आशा॑भ्य॒स्परि॒ सर्वा॑भ्यो॒ अभ॑यं करत्। जेता॒ शत्रू॒न् विच॑र्षणिः ॥१०॥\nक ईं॑ वेद सु॒ते सचा॒ पिब॑न्तं॒ कद् वयो॑ दधे ।\nअ॒यं यः पुरो॑ विभि॒नत्त्योज॑सा मन्दा॒नः शि॒प्र्यन्ध॑सः ॥११॥\nदा॒ना मृ॒गो न वा॑र॒णः पु॑रु॒त्रा च॒रथं॑ दधे ।\nनकि॑ष्ट्वा॒ नि य॑म॒दा सु॒ते ग॑मो म॒हांश्च॑र॒स्योज॑सा ॥१२॥\nय उ॒ग्रः सन्ननि॑ष्टृत स्थि॒रो रणा॑य॒ संस्कृ॑तः ।\nयदि॑ स्तो॒तुर्म॒घवा॑ शृ॒णव॒द्धवं॒ नेन्द्रो॑ योष॒त्या ग॑मत्॥१३॥\nव॒यं घ॑ त्वा सु॒ताव॑न्त॒ आपो॒ न वृ॒क्तब॑र्हिषः ।\nप॒वित्र॑स्य प्र॒स्रव॑णेषु वृत्रह॒न् परि॑ स्तो॒तार॑ आसते ॥१४॥\nस्वर॑न्ति त्वा सु॒ते नरो॒ वसो॑ निरे॒क उ॒क्थिनः॑ ।\nक॒दा सु॒तं तृ॑षा॒ण ओक॒ आ ग॑म॒ इन्द्र॑ स्व॒ब्दीव॒ वंस॑गः ॥१५॥\nकण्वे॑भिर्धृष्ण॒वा धृ॒षद् वाजं॑ दर्षि सह॒स्रिण॑म्।\nपि॒शङ्ग॑रूपं मघवन् विचर्षणे म॒क्षू गोम॑न्तमीमहे ॥१६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 58,
"text": "श्राय॑न्त इव॒ सूर्यं॒ विश्वेदिन्द्र॑स्य भक्षत ।\nवसू॑नि जा॒ते जन॑मान॒ ओज॑सा॒ प्रति॑ भा॒गं न दी॑धिम ॥१॥\nअन॑र्शरातिं वसु॒दामुप॑ स्तुहि भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑ ।\nसो अ॑स्य॒ कामं॑ विध॒तो न रो॑षति॒ मनो॑ दा॒नाय॑ चो॒दय॑न्॥२॥\nबण्म॒हाँ अ॑सि सूर्य॒ बडा॑दित्य म॒हाँ अ॑सि ।\nम॒हस्ते॑ स॒तो म॑हि॒मा प॑नस्यते॒ऽद्धा दे॑व म॒हाँ अ॑सि ॥३॥\nबट् सू॑र्य॒ श्रव॑सा म॒हाँ अ॑सि स॒त्रा दे॑व म॒हाँ अ॑सि ।\nम॒ह्ना दे॒वाना॑मसु॒र्यः पु॒रोहि॑तो वि॒भु ज्योति॒रदा॑भ्यम्॥४॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 59,
"text": "उदु॒ त्ये मधु॑मत्तमा॒ गिर॒ स्तोमा॑स ईरते ।\nस॒त्रा॒जितो॑ धन॒सा अक्षि॑तोतयो वाज॒यन्तो॒ रथा॑ इव ॥१॥\nकण्वा॑ इव॒ भृग॑वः॒ सूर्या॑ इव॒ विश्व॒मिद्धी॒तमा॑नशुः ।\nइन्द्रं॒ स्तोमे॑भिर्म॒हय॑न्त आ॒यवः॑ प्रि॒यमे॑धासो अस्वरन्॥२॥\nउदिन्न्व॑स्य रिच्य॒तेंऽशो धनं॒ न जि॒ग्युषः॑ ।\nय इन्द्रो॒ हरि॑वा॒न्न द॑भन्ति॒ तं रिपो॒ दक्षं॑ दधाति सो॒मिनि॑ ॥३॥\nमन्त्र॒मख॑र्वं॒ सुधि॑तं सु॒पेश॑सं॒ दधा॑त य॒ज्ञिये॒ष्वा।\nपू॒र्वीश्च॒न प्रसि॑तयस्तरन्ति तं य इन्द्रे॒ कर्म॑णा॒ भुव॑त्॥४॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 60,
"text": "ए॒वा ह्यसि॑ वीर॒युरे॒वा शूर॑ उ॒त स्थि॒रः । ए॒वा ते॒ राध्यं॒ मनः॑ ॥१॥\nए॒वा रा॒तिस्तु॑वीमघ॒ विश्वे॑भिर्धायि धा॒तृभिः॑ । अघा॑ चिदिन्द्र मे॒ सचा॑ ॥२॥\nमो षु ब्र॒ह्मेव॑ तन्द्र॒युर्भुवो॑ वाजानां पते । मत्स्वा॑ सु॒तस्य॑ गोम॑तः ॥३॥\nए॒वा ह्य॑स्य सू॒नृता॑ विर॒प्शी गोम॑ती म॒ही। प॒क्वा शाखा॒ न दा॒शुषे॑ ॥४॥\nए॒वा हि ते॑ विभू॑तय ऊ॒तय॑ इन्द्र॒ माव॑ते । स॒द्यश्चि॒त् सन्ति॑ दा॒शुषे॑ ॥५॥\nए॒वा ह्य॑स्य॒ काम्या॒ स्तोम॑ उ॒क्थं च॒ शंस्या॑ । इन्द्रा॑य॒ सोम॑पीतये ॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 61,
"text": "तं ते॒ मदं॑ गृणीमसि॒ वृष॑णं पृ॒त्सु सा॑स॒हिम्। उ॒ लो॒क॒कृ॒त्नुम॑द्रिवो हरि॒श्रिय॑म्॥१॥\nयेन॒ ज्योतीं॑ष्या॒यवे॒ मन॑वे च वि॒वेदि॑थ । म॒न्दा॒नो अ॒स्य ब॒र्हिषो॒ वि रा॑जसि ॥२॥\nतद॒द्या चि॑त्त उ॒क्थिनोऽनु॑ ष्टुवन्ति पू॒र्वथा॑ । वृष॑पत्नीर॒पो ज॑या दि॒वेदि॑वे ॥३॥\nतम्व॒भि प्र गा॑यत पुरुहू॒तं पु॑रुष्टु॒तम् । इन्द्रं॑ गी॒र्भिस्त॑वि॒षमा वि॑वासत ॥४॥\nयस्य॑ द्वि॒बर्ह॑सो बृ॒हत् सहो॑ दा॒धार॒ रोद॑सी । गि॒रींरज्राँ॑ अ॒पः स्वर्वृषत्व॒ना॥५॥\nस रा॑जसि पुरुष्टुतँ एको॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नसे । इन्द्र॒ जैत्रा॑ श्रव॒स्यैऽ च॒ यन्त॑वे ॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 62,
"text": "व॒यमु॒ त्वाम॑पूर्व्य स्थू॒रं न कच्चि॒द् भर॑न्तोऽव॒स्यवः॑ । वाजे॑ चि॒त्रं ह॑वामहे ॥१॥\nउप॑ त्वा॒ कर्म॑न्नू॒तये॑ स नो॒ युवो॒ग्रश्च॑क्राम॒ यो धृ॒षत्।\nत्वामिद्ध्य॑वि॒तारं॑ ववृ॒महे॒ सखा॑य इन्द्र सान॒सिम्॥२॥\nयो न॑ इ॒दमि॑दं पु॒रा प्र वस्य॑ आनि॒नाय॒ तमु॑ व स्तुषे । सखा॑य॒ इन्द्र॑मू॒तये॑ ॥३॥\nहर्य॑श्वं॒ सत्प॑तिं चर्षणी॒सहं॒ स हि ष्मा॒ यो अम॑न्दत ।\nआ तु नः॒ स व॑यति॒ गव्य॒मश्व्यं॑ स्तो॒तृभ्यो॑ म॒घवा॑ श॒तम्॥४॥\nइन्द्रा॑य॒ साम॑ गायत॒ विप्रा॑य बृह॒ते बृ॒हत्। ध॒र्म॒कृते॑ विप॒श्चिते॑ पन॒स्यवे॑ ॥५॥\nत्वमि॑न्द्राभि॒भूर॑सि॒ त्वं सूर्य॑मरोचयः । वि॒श्वक॑र्मा वि॒श्वदे॑वो म॒हाँ अ॑सि ॥६॥\nवि॒भ्राजं॒ ज्योति॑षा॒ स्व॑१रग॑च्छो रोच॒नं दि॒वः । दे॒वास्त॑ इन्द्र स॒ख्याय॑ येमिरे ॥७॥\nतम्व॒भि प्र गा॑यत पुरुहू॒तं पु॑रुष्टु॒तम्। इन्द्रं॑ गी॒र्भिस्त॑वि॒षमा वि॑वासत ॥८॥\nयस्य॑ द्वि॒बर्ह॑सो बृ॒हत् सहो॑ दा॒धार॒ रोद॑सी । गि॒रींरज्रां॑ अ॒पः स्वऽर्वृषत्व॒ना॥९॥\nस रा॑जसि पुरुष्टुतं॒ एको॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नसे । इन्द्र॒ जैत्रा॑ श्रव॒स्याऽ च॒ यन्त॑वे ॥१०॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 63,
"text": "इ॒मा नु कं॒ भुव॑ना सीषधा॒मेन्द्र॑श्च॒ विश्वे॑ च दे॒वाः ।\nय॒ज्ञं च॑ नस्त॒न्वं च प्र॒जां चा॑दि॒त्यैरिन्द्रः॑ स॒ह ची॑क्लृपाति ॥१॥\nआ॒दि॒त्यैरिन्द्रः॒ सग॑णो म॒रुद्भि॑र॒स्माकं॑ भूत्ववि॒ता त॒नूना॑म्।\nह॒त्वाय॑ दे॒वा असु॑रा॒न् यदाय॑न् दे॒वा दे॑व॒त्वम॑भि॒रक्ष॑माणाः ॥२॥\nप्र॒त्यञ्च॑म॒र्कम॑नयं॒ छची॑भि॒रादित् स्व॒धामि॑षि॒रां पर्य॑पश्यन्।\nअ॒या वाजं॑ दे॒वहि॑तं सनेम॒ मदे॑म श॒तहि॑माः सु॒वीराः॑ ॥३॥\nय एक॒ इद् वि॒दय॑ते॒ वसु॒ मर्ता॑य दा॒शुषे॑ । ईशा॑नो॒ अप्र॑तिष्कुत॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग॥४॥\nक॒दा मर्त॑मरा॒धसं॑ प॒दा क्षुम्प॑मिव स्फुरत्। क॒दा नः॑ शुश्रव॒द् गिर॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग॥५॥\nयश्चि॒द्धि त्वा॑ ब॒हुभ्य॒ आ सु॒तावां॑ आ॒विवा॑सति । उ॒ग्रं तत् प॑त्यते॒ शव॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग॥६॥\nय इ॑न्द्र सोम॒पात॑मो॒ मदः॑ शविष्ठ॒ चेत॑ति । येना॒ हंसि॒ न्य॑१त्त्रिणं॒ तमी॑महे ॥७॥\nयेना॒ दश॑ग्व॒मध्रि॑गुं वे॒पय॑न्तं॒ स्वर्णरम्। येना॑ समु॒द्रमावि॑था॒ तमी॑महे ॥८॥\nयेन॒ सिन्धुं॑ म॒हीर॒पो रथां॑ इव प्रचो॒दयः॑ । पन्था॑मृ॒तस्य॒ यात॑वे॒ तमी॑महे ॥९॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 64,
"text": "एन्द्र॑ नो गधि प्रि॒यः स॑त्रा॒जिदगो॑ह्यः । गि॒रिर्न वि॒श्वत॑स्पृ॒थुः पति॑र्दि॒वः ॥१॥\nअ॒भि हि स॑त्य सोमपा उ॒भे ब॒भूथ॒ रोद॑सी । इन्द्रासि॑ सुन्व॒तो वृ॒धः पति॑र्दि॒वः ॥२॥\nत्वं हि शश्व॑तीना॒मिन्द्र॑ द॒र्ता पु॒रामसि॑ । ह॒न्ता दस्यो॒र्मनो॑र्वृ॒धः पति॑र्दि॒वः ॥३॥\nएदु॒ मध्वो॑ म॒दिन्त॑रं सि॒ञ्च वा॑ध्वर्यो॒ अन्ध॑सः । एवा हि वी॒र स्तव॑ते स॒दावृ॑धः ॥४॥\nइन्द्र॑ स्थातर्हरीणां॒ नकि॑ष्टे पू॒र्व्यस्तु॑तिम्। उदा॑नंश॒ शव॑सा॒ न भ॒न्दना॑ ॥५॥\nतं वो॒ वाजा॑नां॒ पति॒महू॑महि श्रव॒स्यवः॑ । अप्रा॑युभिर्य॒ज्ञेभि॑र्वावृ॒धेन्य॑म्॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 65,
"text": "ए॒तो न्विन्द्रं॒ स्तवा॑म॒ सखा॑य॒ स्तोम्यं॒ नर॑म्। कु॒ष्टीर्यो विश्वा॑ अ॒भ्यस्त्येक॒ इत्॥१॥\nअगो॑रुधाय ग॒विषे॑ द्यु॒क्षाय॒ दस्म्यं॒ वचः॑ । घृ॒तात् स्वादी॑यो॒ मधु॑नश्च वोचत ॥२॥\nयस्यामि॑तानि वी॒र्या॒ न राधः॒ पर्ये॑तवे । ज्योति॒र्न विश्व॑म॒भ्यस्ति॒ दक्षि॑णा ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 66,
"text": "स्तु॒हीन्द्रं॑ व्यश्व॒वदनू॑र्मिं वा॒जिनं॒ यम॑म्। अ॒र्यो गयं॒ मंह॑मानं॒ वि दा॒शुषे॑ ॥१॥\nए॒वा नू॒नमुप॑ स्तुहि॒ वैय॑श्व दश॒मं नव॑म्। सुवि॑द्वांसं च॒र्कृत्यं॑ च॒रणी॑नाम्॥२॥\nवेत्था॒ हि निरृ॑तीनां॒ वज्र॑हस्त परि॒वृज॑म्। अह॑रहः शु॒न्ध्युः प॑रि॒पदा॑मिव ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 67,
"text": "सव॒नोति॒ हि सु॒न्वन् क्षयं॒ परी॑णसः सुन्वा॒नो हि ष्मा॒ यज॒त्यव॒ द्विषो॑ दे॒वाना॒मव॒ द्विषः॑ ।\nसु॒न्वा॒न इत् सि॑षासति स॒हस्रा॑ वा॒ज्यवृ॑तः ।\nसु॒न्वा॒नायेन्द्रो॑ ददात्या॒भुवं॑ र॒यिं द॑दात्या॒भुव॑म्॥१॥\nमो षु वो॑ अ॒स्मद॒भि तानि॒ पौंस्या॒ सना॑ भूवन् द्यु॒म्नानि॒ मोत जा॑रिषुर॒स्मत् पु॒रोत जा॑रिषुः ।\nयद् व॑श्चि॒त्रं यु॒गेयु॑गे॒ नव्यं॒ घोषा॒दम॑र्त्यम्।\nअ॒स्मासु॒ तन्म॑रुतो॒ यच्च॑ दु॒ष्टृरं॑ दिधृ॒ता यच्च॑ दु॒ष्टर॑म्॥२॥\nअ॒ग्निं होता॑रं मन्ये॒ दास्व॑न्तं॒ वसुं॑ सू॒नुं सह॑सो जा॒तवे॑दसं॒ विप्रं॒ न जा॒तवे॑दसम्।\nय ऊ॒र्ध्वया॑ स्वध्व॒रो दे॒वो दे॒वाच्या॑ कृ॒पा।\nघृ॒तस्य॒ विभ्रा॑ष्टि॒मनु॑ वष्टि शो॒चिषा॒जुह्वा॑नस्य स॒र्पिषः॑ ॥३॥\nय॒ज्ञैः समि॑श्लाः॒ पृष॑तीभिरृ॒ष्टिभि॒र्यामं॑ छु॒भ्रासो॑ अ॒ञ्जिषु॑ प्रि॒या उ॒त।\nआ॒सद्या॑ ब॒र्हिर्भ॑रतस्य सूनवः पो॒त्रादा सोमं॑ पिबता दिवो नरः ॥४॥\nआ व॑क्षि दे॒वां इ॒ह वि॑प्र॒ यक्षि॑ चो॒शन् हो॑त॒र्नि ष॑दा॒ योनि॑षु त्रि॒षु।\nप्रति॑ वीहि॒ प्रस्थि॑तं सो॒म्यं मधु॒ पिबाग्नी॑ध्रा॒त् तव॑ भा॒गस्य॑ तृष्णुहि ॥५॥\nए॒ष स्य ते॑ त॒न्वो नृम्ण॒वर्ध॑नः॒ सह॒ ओजः॑ प्र॒दिवि॑ बा॒ह्वोर्हि॒तः ।\nतुभ्यं॑ सु॒तो म॑घवन् तुभ्य॒माभृ॑त॒स्त्वम॑स्य॒ ब्राह्म॑णा॒दा तृ॒पत् पि॑ब ॥६॥\nयमु॒ पूर्वमहु॑वे॒ तमि॒दं हु॑वे॒ सेदु॒ हव्यो॑ द॒दिर्यो नाम॒ पत्य॑ते ।\nअ॒ध्व॒र्युभिः॒ प्रस्थि॑तं सो॒म्यं मधु॑ पो॒त्रात् सोमं॑ द्रविणोदः॒ पिब॑ ऋ॒तुभिः॑ ॥७॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 68,
"text": "सु॒रू॒प॒कृ॒त्नुमू॒तये॑ सु॒दुघा॑मिव गो॒दुहे॑ । जु॒हू॒मसि॒ द्यवि॑द्यवि ॥१॥\nउप॑ नः॒ सव॒ना ग॑हि॒ सोम॑स्य सोमपाः पिब । गो॒दा इद् रे॒वतो॒ मदः॑ ॥२॥\nअथा॑ ते॒ अन्त॑मानां वि॒द्याम॑ सुमती॒नाम्। मा नो॒ अति॑ ख्य॒ आ ग॑हि ॥३॥\nपरे॑हि॒ विग्र॒मस्तृ॑त॒मिन्द्रं॑ पृच्छा विप॒श्चित॑म्। यस्ते॒ सखि॑भ्य॒ आ वर॑म्॥४॥\nउ॒त ब्रु॑वन्तु नो॒ निदो॒ निर॒न्यत॑श्चिदारत । दधा॑ना॒ इन्द्र॒ इद् दुवः॑ ॥५॥\nउ॒त नः॑ सु॒भगां॑ अ॒रिर्वो॒चेयु॑र्दस्म कृ॒ष्टयः॑ । स्यामेदिन्द्र॑स्य॒ शर्म॑णि ॥६॥\nएमा॒शुमा॒शवे॑ भर यज्ञ॒श्रियं॑ नृ॒माद॑नम्। प॒त॒यन्म॑न्द॒यत्स॑खम्॥७॥\nअ॒स्य पी॒त्वा श॑तक्रतो घ॒नो वृ॒त्राणा॑मभवः । प्रावो॒ वाजे॑षु वा॒जिन॑म्॥८॥\nतं त्वा॒ वाजे॑षु वा॒जिनं॑ वा॒जया॑मः शतक्रतो । धना॑नामिन्द्र सा॒तये॑ ॥९॥\nयो रा॒यो॒३ऽवनि॑र्म॒हान्त्सु॑पा॒रः सु॑न्व॒तः सखा॑ । तस्मा॒ इन्द्रा॑य गायत ॥१०॥\nआ त्वेता॒ नि षी॑द॒तेन्द्र॑म॒भि प्र गा॑यत । सखा॑य॒ स्तोम॑वाहसः ॥११॥\nपु॒रू॒तमं॑ पुरू॒णामीशा॑नं॒ वार्या॑णाम्। इन्द्रं॒ सोमे॒ सचा॑ सु॒ते॥१२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 69,
"text": "स घा॑ नो॒ योग॒ आ भु॑व॒त् स रा॒ये स पुरं॑ध्याम्। गम॒द् वाजे॑भि॒रा स नः॑ ॥१॥\nयस्य॑ सं॒स्थे न वृ॒ण्वते॒ हरी॑ स॒मत्सु॒ शत्र॑वः । तस्मा॒ इन्द्रा॑य गायत ॥२॥\nसु॒त॒पाव्ने॑ सु॒ता इ॒मे शुच॑यो यन्ति वी॒तये॑ । सोमा॑सो॒ दध्या॑शिरः ॥३॥\nत्वं सु॒तस्य॑ पी॒तये॑ स॒द्यो वृ॒द्धो अ॑जायथाः । इन्द्र॒ ज्यैष्ठ्या॑य सुक्रतो ॥४॥\nआ त्वा॑ विशन्त्वा॒शवः॒ सोमा॑स इन्द्र गिर्वणः । शं ते॑ सन्तु॒ प्रचे॑तसे ॥५॥\nत्वां स्तोमा॑ अवीवृध॒न् त्वामु॒क्था श॑तक्रतो । त्वां व॑र्धन्तु नो॒ गिरः॑ ॥६॥\nअक्षि॑तोतिः सनेदि॒मं वाज॒मिन्द्रः॑ सह॒स्रिण॑म्। यस्मि॒न् विश्वा॑नि॒ पौंस्या॑ ॥७॥\nमा नो॒ मर्ता॑ अ॒भि द्रु॑हन् त॒नूना॑मिन्द्र गिर्वणः । ईशा॑नो यवया व॒धम्॥८॥\nयु॒ञ्जन्ति॑ ब्र॒ध्नम॑रु॒षं चर॑न्तं॒ परि॑ त॒स्थुषः॑ । रोच॑न्ते रोच॒ना दि॒वि॥९॥\nयु॒ञ्जन्त्य॑स्य॒ काम्या॒ हरी॒ विप॑क्षसा॒ रथे॑ । शोणा॑ धृ॒ष्णू नृ॒वाह॑सा ॥१०॥\nके॒तुं कृ॒ण्वन्न॑के॒तवे॒ पेशो॑ मर्या अपे॒शसे॑ । समु॒षद्भि॑रजायथाः ॥११॥\nआदह॑ स्व॒धामनु॒ पुन॑र्गर्भ॒त्वमे॑रि॒रे। दधा॑ना॒ नाम॑ य॒ज्ञिय॑म्॥१२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 70,
"text": "वी॒लु चि॑दारुज॒त्नुभि॒र्गुहा॑ चिदिन्द्र॒ वह्नि॑भिः । अवि॑न्द उ॒स्रिया॒ अनु॑ ॥१॥\nदे॒व॒यन्तो॒ यथा॑ म॒तिमच्छा॑ वि॒दद् व॑सुं॒ गिरः॑ । म॒हाम॑नूषत श्रु॒तम्॥२॥\nइन्द्रे॑ण॒ सं हि दृक्ष॑से संजग्मा॒नो अबि॑भ्युषा । म॒न्दू स॑मा॒नव॑र्चसा ॥३॥\nअ॒न॒व॒द्यैर॒भिद्यु॑भिर्म॒खः सह॑स्वदर्चति । ग॒णैरिन्द्र॑स्य॒ काम्यैः॑ ॥४॥\nअतः॑ परिज्म॒न्ना ग॑हि दि॒वो वा॑ रोच॒नादधि॑ । सम॑स्मिन्नृञ्जते॒ गिरः॑ ॥५॥\nइ॒तो वा॑ सा॒तिमीम॑हे दि॒वो वा॒ पार्थि॑वा॒दधि॑ । इन्द्रं॑ म॒हो वा॒ रज॑सः ॥६॥\nइन्द्र॒मिद् गा॒थिनो॑ बृ॒हदिन्द्र॑म॒र्केभि॑र॒र्किणः॑ । इन्द्रं॒ वाणी॑रनूषत ॥७॥\nइन्द्र॒ इद्धर्योः॒ सचा॒ संमि॑श्ल॒ आ व॑चो॒युजा॑ । इन्द्रो॑ व॒ज्री हि॑र॒ण्ययः॑ ॥८॥\nइन्द्रो॑ दी॒र्घाय॒ चक्ष॑स॒ आ सूर्यं॑ रोहयद् दि॒वि। वि गोभि॒रिन्द्र॑मैरयत्॥९॥\nइन्द्र॒ वाजे॑षु नोऽव स॒हस्र॑प्रधनेषु च । उ॒ग्र उ॒ग्राभि॑रू॒तिभिः॑ ॥१०॥\nइन्द्रं॑ व॒यं म॑हाध॒न इन्द्र॒मर्भे॑ हवामहे । युजं॑ वृ॒त्रेषु॑ व॒ज्रिण॑म्॥११॥\nस नो॑ वृषन्न॒मुं च॒रुं सत्रा॑दाव॒न्नपा॑ वृधि । अ॒स्मभ्य॒मप्र॑तिष्कुतः ॥१२॥\nतु॒ञ्जेतु॑ञ्जे॒ य उत्त॑रे॒ स्तोमा॒ इन्द्र॑स्य व॒ज्रिणः॑ । न वि॑न्धे अस्य सुष्टु॒तिम्॥१३॥\nवृषा॑ यू॒थेव॒ वंस॑गः कृ॒ष्टीरि॑य॒र्त्योज॑सा । ईशा॑नो॒ अप्र॑तिष्कुतः ॥१४॥\nय एक॑श्चर्षणी॒नां वसू॑नामिर॒ज्यति॑ । इन्द्रः॒ पञ्च॑ क्षिती॒नाम्॥१५॥\nइन्द्रं॑ वो वि॒श्वत॒स्परि॒ हवा॑महे॒ जने॑भ्यः । अ॒स्माक॑मस्तु॒ केव॑लः ॥१६॥\nएन्द्र॑ सान॒सिं र॒यिं स॒जित्वा॑नं सदा॒सह॑म्। वर्षि॑ष्ठमू॒तये॑ भर ॥१७॥\nनि येन॑ मुष्टिह॒त्यया॒ नि वृ॒त्रा रु॒णधा॑महै । त्वोता॑सो॒ न्यर्व॑ता ॥१८॥\nइन्द्र॒ त्वोता॑स॒ आ व॒यं वज्रं॑ घ॒ना द॑दीमहि । जये॑म॒ सं यु॒धि स्पृधः॑ ॥१९॥\nव॒यं शूरे॑भि॒रस्तृ॑भि॒रिन्द्र॒ त्वया॑ यु॒जा व॒यम्। सा॒स॒ह्याम॑ पृतन्य॒तः ॥२०॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 71,
"text": "म॒हां इन्द्रः॑ प॒रश्च॒ नु म॑हि॒त्वम॑स्तु व॒ज्रिणे । द्यौर्न प्र॑थि॒ना शवः॑ ॥१॥\nस॒मो॒हे वा॒ य आश॑त॒ नर॑स्तो॒कस्य॒ सनि॑तौ । विप्रा॑सो वा धिया॒यवः॑ ॥२॥\nयः कु॒क्षिः सो॑म॒पात॑मः समु॒द्र इ॑व॒ पिन्व॑ते । उ॒र्वीरापो॒ न का॒कुदः॑ ॥३॥\nए॒वा ह्य॑स्य सू॒नृता॑ विर॒प्शी गोम॑ती म॒ही। प॒क्वा शाखा॒ न दा॒शुषे॑ ॥४॥\nए॒वा हि ते॒ विभू॑तय ऊ॒तय॑ इन्द्र॒ माव॑ते । स॒द्यश्चि॒त् सन्ति॑ दा॒शुषे॑ ॥५॥\nए॒वा ह्य॑स्य॒ काम्या॒ स्तोम॑ उ॒क्थं च॒ शंस्या॑ । इन्द्रा॑य॒ सोम॑पीतये ॥६॥\nइन्द्रेहि॒ मत्स्यन्ध॑सो॒ विश्वे॑भिः सोम॒पर्व॑भिः । म॒हां अ॑भि॒ष्टिरोज॑सा ॥७॥\nएमे॑नं सृजता सु॒ते म॒न्दिमिन्द्रा॑य म॒न्दिने॑ । चक्रिं॒ विश्वा॑नि॒ चक्र॑ये ॥८॥\nमत्स्वा॑ सुशिप्र म॒न्दिभि॒ स्तोमे॑भिर्विश्वचर्षणे । सचै॒षु सव॑ने॒ष्वा॥९॥\nअसृ॑ग्रमिन्द्र ते॒ गिरः॒ प्रति॒त्वामुद॑हासत । अजो॑षा वृष॒भं पति॑म्॥१०॥\nसं चो॑दय चि॒त्रम॒र्वाग् राध॑ इन्द्र॒ वरे॑ण्यम्। अस॒दित् ते॑ वि॒भु प्र॒भु॥११॥\nअ॒स्मान्त्सु तत्र॑ चोद॒येन्द्र॑ रा॒ये रभ॑स्वतः । तुवि॑द्युम्न॒ यश॑स्वतः ॥१२॥\nसं गोम॑दिन्द्र॒ वाज॑वद॒स्मे पृ॒थु श्रवो॑ बृ॒हत्। वि॒श्वायु॑र्धे॒ह्यक्षि॑तम्॥१३॥\nअ॒स्मे धे॑हि॒ श्रवो॑ बृ॒हद् द्यु॒म्नं स॑हस्र॒सात॑मम्। इन्द्र॒ ता र॒थिनी॒रिषः॑ ॥१४॥\nवसो॒रिन्द्रं॒ वसु॑पतिं गी॒र्भिर्गृ॒णन्त॑ ऋ॒ग्मिय॑म्। होम॒ गन्ता॑रमू॒तये॑ ॥१५॥\nसु॒तेसु॑ते॒ न्योऽकसे बृ॒हद् बृ॑ह॒त एद॒रिः । इन्द्रा॑य शू॒षम॑र्चति ॥१६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 72,
"text": "विश्वे॑षु॒ हि त्वा॒ सव॑नेषु तु॒ञ्जते॑ समा॒नमेकं॒ वृष॑मण्यवः॒ पृथ॒क् स्वः सनि॒ष्यवः॒ पृथक्।\nतं त्वा॒ नावं॒ न प॒र्षणिं॑ शू॒षस्य॑ धु॒रि धी॑महि ।\nइन्द्रं॒ न य॒ज्ञैश्च॒तय॑न्त आ॒यव॒ स्तोमे॑भि॒रिन्द्र॑मा॒यवः॑ ॥१॥\nवि त्वा॑ ततस्रे मिथु॒ना अ॑व॒स्यवो॑ व्र॒जस्य॑ सा॒ता गव्य॑स्य निः॒सृजः॒ सक्ष॑न्त इन्द्र निः॒सृजः॑ ।\nयद् ग॒व्यन्ता॒ द्वा जना॒ स्व॑१र्यन्ता॑ स॒मूह॑सि ।\nआ॒विष्करि॑क्र॒द् वृष॑णं सचा॒भुवं॒ वज्र॑मिन्द्र सचा॒भुव॑म्॥२॥\nउ॒तो नो॑ अ॒स्या उ॒षसो॑ जु॒षेत॒ ह्य॑१र्कस्य॑ बोधि ह॒विषो॒ हवी॑मभिः॒ स्व॑र्षाता॒ हवी॑मभिः ।\nयदि॑न्द्र॒ हन्त॑वे॒ मृघो॒ वृषा॑ वज्रिं॒ चिके॑तसि ।\nआ मे॑ अ॒स्य वे॒धसो॒ नवी॑यसो॒ मन्म॑ श्रुधि॒ नवी॑यसः ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 73,
"text": "तुभ्येदि॒मा सव॑ना शूर॒ विश्वा॒ तुभ्यं॒ ब्रह्मा॑णि॒ वर्ध॑ना कृणोमि । त्वं नृभि॒र्हव्यो॑ वि॒श्वधा॑सि ॥१॥\nनू चि॒न्नु ते॒ मन्य॑मानस्य द॒स्मोद॑श्नुवन्ति महि॒मान॑मुग्र । न वीर्यऽमिन्द्र ते॒ न राधः॑ ॥२॥\nप्र वो॑ म॒हे म॑हि॒वृधे॑ भरध्वं॒ प्रचे॑तसे॒ प्र सु॑म॒तिं कृ॑णुध्वम्।\nविशः॑ पू॒र्वीः प्र च॑रा चर्षणि॒प्राः ॥३॥\nय॒दा वज्रं॒ हिर॑ण्य॒मिदथा॒ रथं॒ हरी॒ यम॑स्य॒ वह॑तो॒ वि सू॒रिभिः॑ ।\nआ ति॑ष्ठति म॒घवा॒ सन॑श्रुत॒ इन्द्रो॒ वाज॑स्य दी॒र्घश्र॑वस॒स्पतिः॑ ॥४॥\nसो चि॒न्नु वृ॒ष्टिर्यू॒थ्या॒३ स्वा सचां॒ इन्द्रः॒ श्मश्रू॑णि॒ हरि॑ता॒भि प्रु॑ष्णुते ।\nअव॑ वेति सु॒क्षयं॑ सु॒ते मधूदिद् धू॑णोति॒ वातो॒ यथा॒ वन॑म्॥५॥\nयो वा॒चा विवा॑चो मृ॒ध्रवा॑चः पु॒रू स॒हस्राशि॑वा ज॒घान॑ ।\nतत्त॒दिद॑स्य॒ पौंस्यं॑ गृणीमसि पि॒तेव॒ यस्तवि॑षीं वावृ॒धे शवः॑ ॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 74,
"text": "यच्चि॒द्धि स॑त्य सोमपा अनाश॒स्ता इ॑व॒ स्मसि॑ ।\nआ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥१॥\nशिप्रि॑न् वाजानां पते॒ शची॑व॒स्तव॑ दं॒सना॑ ।\nआ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥२॥\nनि ष्वा॑पया मिथू॒दृशा॑ स॒स्तामबु॑ध्यमाने ।\nआ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥३॥\nस॒सन्तु॒ त्या अरा॑तयो॒ बोध॑न्तु शूर रा॒तयः॑ ।\nआ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥४॥\nसमि॑न्द्र गर्द॒भं मृ॑ण नु॒वन्तं॑ पा॒पया॑मु॒या।\nआ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥५॥\nपता॑ति कुण्डृ॒णाच्या॑ दू॒रं वातो॒ वना॒दधि॑ ।\nआ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥६॥\nसर्वं॑ परिक्रो॒शं ज॑हि ज॒म्भया॑ कृकदा॒श्वऽम्।\nआ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥७॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 75,
"text": "वि त्वा॑ ततस्रे मिथु॒ना अ॑व॒स्यवो॑ व्र॒जस्य॑ सा॒ता गव्य॑स्य निः॒सृजः॒ सक्ष॑न्त इन्द्र निः॒सृजः॑ ।\nयद् ग॒व्यन्त॒ द्वा जना॒ स्व॑१र्यन्ता॑ स॒मूह॑सि ।\nआ॒विष्करि॑क्र॒द् वृषणं सचा॒भुवं॒ वज्र॑मिन्द्र सचा॒भुव॑म्॥१॥\nवि॒दुष्टे॑ अ॒स्य वी॒र्यऽस्य पू॒रवः॒ पुरो॒ यदि॑न्द्र॒ शार॑दीर॒वाति॑रः सासहा॒नो अ॒वाति॑रः ।\nशास॒स्तमि॑न्द्र॒ मर्त्य॒मय॑जुं शवसस्पते ।\nम॒हीम॑मुष्णाः पृथि॒वीमि॒मा अ॒पो म॑न्दसा॒न इ॒मा अ॒पः ॥२॥\nआदित् ते॑ अ॒स्य वी॒र्यऽस्य चर्किर॒न् मदे॑षु वृषन्नु॒शिजो॒ यदावि॑थ सखीय॒तो यदावि॑थ ।\nच॒कर्थ॑ का॒रमे॑भ्यः॒ पृत॑नासु॒ प्रव॑न्तवे ।\nते अ॒न्याम॑न्यां न॒द्यं सनिष्णत श्रव॒स्यन्तः॑ सनिष्णत ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 76,
"text": "वने॒ न वा॒ यो न्य॑धायि चा॒क्रं छुचि॑र्वां॒ स्तोमो॑ भुरणावजीगः ।\nयस्येदिन्द्रः॑ पुरु॒दिने॑षु॒ होता॑ नृ॒णां नर्यो॒ नृत॑मः क्ष॒पावा॑न्॥१॥\nप्र ते॑ अ॒स्या उ॒षसः॒ प्राप॑रस्या नृ॒तौ स्या॑म॒ नृत॑मस्य नृ॒णाम्।\nअनु॑ त्रि॒शोकः॑ श॒तमाव॑ह॒न्नॄन् कुत्से॑न॒ रथो॒ यो अस॑त् सस॒वान्॥२॥\nकस्ते॒ मद॑ इन्द्र॒ रन्त्यो॑ भू॒द् दुरो॒ गिरो॑ अ॒भ्यु॑१ग्रो वि धा॑व ।\nकद् वाहो॑ अ॒र्वागुप॑ मा मनी॒षा आ त्वा॑ शक्यामुप॒मं राधो॒ अन्नैः॑ ॥३॥\nकदु॑ द्यु॒म्नमि॑न्द्र॒ त्वाव॑तो॒ नॄन् कया॑ धि॒या क॑रसे॒ कन्न॒ आग॑न्।\nमि॒त्रो न स॒त्य उ॑रुगाय भृ॒त्या अन्ने॑ समस्य॒ यदस॑न् मनी॒षाः ॥४॥\nप्रेर॑य॒ सूरो॒ अर्थं॒ न पा॒रं ये अ॑स्य॒ कामं॑ जनि॒धा इ॑व॒ ग्मन्।\nगिर॑श्च॒ ये ते॑ तुविजात पू॒र्वीर्नर॑ इन्द्र प्रति॒शिक्ष॒न्त्यन्नैः॑ ॥५॥\nमात्रे॒ नु ते॒ सुमि॑ते इन्द्र पू॒र्वी द्यौर्म॒ज्मना॑ पृथि॒वी काव्ये॑न ।\nवरा॑य ते घृ॒तव॑न्तः सु॒तासः॒ स्वाद्न॑न् भवन्तु पी॒तये॒ मधू॑नि ॥६॥\nआ मध्वो॑ अस्मा असिच॒न्नम॑त्र॒मिन्द्रा॑य पू॒र्णं स हि स॒त्यरा॑धाः ।\nस वा॑वृधे॒ वरि॑म॒न्ना पृ॑थि॒व्या अ॒भि क्रत्वा॒ नर्यः॒ पौंस्यै॑श्च ॥७॥\nव्या॑न॒लिन्द्रः॒ पृत॑नाः॒ स्वोजा॒ आस्मै॑ यतन्ते स॒ख्याय॑ पू॒र्वीः ।\nआ स्मा॒ रथं॒ न पृत॑नासु तिष्ठ॒ यं भ॒द्रया॑ सुम॒त्या चो॒दया॑से ॥८॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 77,
"text": "आ स॒त्यो या॑तु म॒घवां॑ ऋजी॒षी द्रव॑न्त्वस्य॒ हर॑य॒ उप॑ नः ।\nतस्मा॒ इदन्धः॑ सुषुमा सु॒दक्ष॑मि॒हाभि॑पि॒त्वं क॑रते गृणा॒नः ॥१॥\nअव॑ स्य शू॒राध्व॑नो॒ नान्ते॒ऽस्मिन् नो॑ अ॒द्य सव॑ने म॒न्दध्यै॑ ।\nशंसा॑त्यु॒क्थमु॒शने॑व वे॒धाश्चि॑कि॒तुषे॑ असु॒र्याऽय मन्म॑ ॥२॥\nक॒विर्न नि॒ण्यं वि॒दथा॑नि॒ साध॒न् वृषा॒ यत् सेकं॑ विपिपा॒नो अर्चा॑त्।\nदि॒व इ॒त्था जी॑जनत् स॒प्त का॒रूनह्ना॑ चिच्चक्रुर्व॒युना॑ गृ॒णन्तः॑ ॥३॥\nस्व॑१र्यद् वेदि॑ सु॒दृशी॑कम॒र्कैर्महि॒ ज्योती॑ रुरुचु॒र्यद्ध॒ वस्तोः॑ ।\nअ॒न्धा तमां॑सि॒ दुधि॑ता वि॒चक्षे॒ नृभ्य॑श्चकार॒ नृत॑मो अ॒भिष्टौ॑ ॥४॥\nव॒व॒क्ष इन्द्रो॒ अमि॑तमृजि॒ष्यु॑१भे आ प॑प्रौ॒ रोद॑सी महि॒त्वा।\nअत॑श्चिदस्य महि॒मा वि रे॑च्य॒भि यो विश्वा॒ भुव॑ना ब॒भूव॑ ॥५॥\nविश्वा॑नि श॒क्रो नर्या॑णि वि॒द्वान॒पो रि॑रेच॒ सखि॑भि॒र्निका॑मैः ।\nअश्मा॑नं चि॒द् ये बि॑भि॒दुर्वचो॑भिर्व्र॒जं गोम॑न्तमु॒शिजो॒ वि व॑व्रुः ॥६॥\nअ॒पो वृ॒त्रं व॑व्रि॒वांसं॒ परा॑ह॒न् प्राव॑त् ते॒ वज्रं॑ पृथि॒वी सचे॑ताः ।\nप्रार्णां॑सि समु॒द्रिया॑ण्यैनोः॒ पति॒र्भवं॒ छव॑सा शूर धृष्णो ॥७॥\nअ॒पो यदद्रिं॑ पुरुहूत॒ दर्द॑रा॒विर्भु॑वत् स॒रमा॑ पू॒र्व्यं ते॑ ।\nस नो॑ ने॒ता वाज॒मा द॑र्षि॒ भूरिं॑ गो॒त्रा रु॒जन्नङ्गि॑रोभिर्गृणा॒नः ॥८॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 78,
"text": "तद् वो॑ गाय सु॒ते सचा॑ पुरुहू॒ताय॒ सत्व॑ने । शं यद् गवे॒ न शा॒किने॑ ॥१॥\nन घा॒ वसु॒र्नि य॑मते दा॒नं वाज॑स्य॒ गोम॑तः । यत् सी॒मुप॒ श्रव॒द् गिरः॑ ॥२॥\nकु॒वित्स॑स्य॒ प्र हि व्र॒जं गोम॑न्तं दस्यु॒हा गम॑त्। शची॑भि॒रप॑ नो वरत्॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 79,
"text": "इन्द्र॒ क्रतुं॑ न॒ आ भ॑र पि॒ता पु॒त्रेभ्यो॒ यथा॑ ।\nशिक्षा॑ णो अ॒स्मिन् पु॑रुहूत॒ याम॑नि जी॒वा ज्योति॑रशीमहि ॥१॥\nमा नो अज्ञा॑ता वृ॒जना॑ दुरा॒ध्यो॒३माशि॑वासो॒ अव॑ क्रमुः ।\nत्वया॑ व॒यं प्र॒वतः॒ शश्व॑तीर॒पोऽति॑ शूर तरामसि ॥२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 80,
"text": "इन्द्र॒ ज्येष्ठं॑ न आ भ॑रं॒ ओजि॑ष्ठं॒ पपु॑रि॒ श्रवः॑ ।\nयेने॒मे चि॑त्र वज्रहस्त॒ रोद॑सी॒ ओभे सु॑शिप्र॒ प्राः ॥१॥\nत्वामु॒ग्रमव॑से चर्षणी॒सहं॒ राज॑न् दे॒वेषु॑ हूमहे ।\nविश्वा॒ सु नो॑ विथु॒रा पि॑ब्द॒ना व॑सो॒ऽमित्रा॑न् सु॒षहा॑न् कृधि ॥२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 81,
"text": "यद् द्याव॑ इन्द्र ते श॒तं श॒तं भूमि॑रु॒त स्युः ।\nन त्वा॑ वज्रिन्त्स॒हस्रं॒ सूर्या॒ अनु॒ न जा॒तम॑ष्ट॒ रोद॑सी ॥१॥\nआ प॑प्राथ महि॒ना वृष्ण्या॑ वृष॒न् विश्वा॑ शविष्ठ॒ शव॑सा ।\nअ॒स्मां अ॑व मघव॒न् गोम॑ति व्र॒जे वज्रिं चि॒त्राभि॑रू॒तिभिः॑ ॥२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 82,
"text": "यदि॑न्द्र॒ याव॑त॒स्त्वमे॒ताव॑द॒हमीशी॑य ।\nस्तो॒तार॒मिद् दि॑धिषेय रदावसो॒ न पा॑प॒त्वाय॑ रासीय ॥१॥\nशिक्षे॑य॒मिन्म॑हय॒ते दि॒वेदि॑वे रा॒य आ कु॑हचि॒द्विदे॑ ।\nन॒हि त्वद॒न्यन्म॑घवन् न॒ आप्यं॒ वस्यो॒ अस्ति॑ पि॒ता च॒न॥२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 83,
"text": "इन्द्र॑ त्रि॒धातु॑ शर॒णं त्रि॒वरू॑थं स्वस्ति॒मत्।\nछ॒र्दिर्य॑च्छ म॒घव॑द्भ्यश्च॒ मह्यं॑ च या॒वया॑ दि॒द्युमे॑भ्यः ॥१॥\nये ग॑व्य॒ता मन॑सा॒ शत्रु॑माद॒भुर॑भिप्र॒घ्नन्ति॑ धृष्णु॒या।\nअघ॑ स्मा नो मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनू॒पा अन्त॑मो भव ॥२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 84,
"text": "इन्द्रा या॑हि चित्रभानो सु॒ता इ॒मे त्वा॒यवः॑ । अण्वी॑भि॒स्तना॑ पू॒तासः॑ ॥१॥\nइन्द्रा या॑हि धि॒येषि॒तो विप्र॑जूतः सु॒ताव॑तः । उप॒ ब्रह्मा॑णि वा॒घतः॑ ॥२॥\nइन्द्रा या॑हि॒ तूतु॑जान॒ उप॒ ब्रह्मा॑णि हरिवः । सु॒ते द॑धिष्व न॒श्चनः॑ ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 85,
"text": "मा चि॑द॒न्यद् वि शं॑सत॒ सखा॑यो॒ मा रि॑षण्यत ।\nइन्द्र॒मित् स्तो॑ता॒ वृष॑णं॒ सचा॑ सु॒ते मुहु॑रु॒क्था च॑ शंसत ॥१॥\nअ॒व॒क्र॒क्षिणं॑ वृष॒भं य॑था॒जुरं॒ गां न च॑र्षणी॒सह॑म्।\nवि॒द्वेष॑णं सं॒वन॑नोभयंक॒रं मंहि॑ष्ठमुभया॒विन॑म्॥२॥\nयच्चि॒द्धि त्वा॒ जना॑ इ॒मे नाना॒ हव॑न्त ऊ॒तये॑ ।\nअ॒स्माकं॒ ब्रह्मे॒दमि॑न्द्र भूतु॒ तेहा॒ विश्वा॑ च॒ वर्ध॑नम्॥३॥\nवि त॑र्तूर्यन्ते मघवन् विप॒श्चितो॒ऽर्यो विपो॒ जना॑नाम्।\nउप॑ क्रमस्व पुरु॒रूप॒मा भ॑र॒ वाजं॒ नेदि॑ष्ठमू॒तये॑ ॥४॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 86,
"text": "ब्रह्म॑णा ते ब्रह्म॒युजा॑ युनज्मि॒ हरी॒ सखा॑या सध॒माद॑ आ॒शू।\nस्थि॒रं रथं॑ सु॒खमि॑न्द्राधि॒तिष्ठ॑न् प्रजा॒नन् वि॒द्वां॑ उप॑ याहि॒ सोम॑म्॥१॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 87,
"text": "अध्व॑र्यवोऽरु॒णं दु॒ग्धमं॒शुं जु॒होत॑न वृष॒भाय॑ क्षिती॒नाम्।\nगौ॒राद् वेदी॑यां अव॒पान॒मिन्द्रो॑ वि॒श्वाहेद् या॑ति सु॒तसो॑ममि॒च्छन्॥१॥\nयद् द॑धि॒षे प्र॒दिवि॒ चार्वन्नं॑ दि॒वेदि॑वे पी॒तिमिद॑स्य वक्षि ।\nउ॒त हृ॒दोत मन॑सा जुषा॒ण उ॒शन्नि॑न्द्र॒ प्रस्थि॑तान् पाहि॒ सोमा॑न्॥२॥\nज॒ज्ञा॒नः सोमं॒ सह॑से पपाथ॒ प्र ते॑ मा॒ता म॑हि॒मान॑मुवाच ।\nएन्द्र॑ पप्राथो॒र्व॑१न्तरि॑क्षं यु॒धा दे॒वेभ्यो॒ वरि॑वश्चकर्थ ॥३॥\nयद् यो॒धया॑ मह॒तो मन्य॑माना॒न् साक्षा॑म॒ तान् बा॒हुभिः॒ शाश॑दानान्।\nयद् वा॒ नृभि॒र्वृत॑ इन्द्राभि॒युध्या॒स्तं त्वया॒जिं सौ॑श्रव॒सं ज॑येम ॥४॥\nप्रेन्द्र॑स्य वोचं प्रथ॒मा कृ॒तानि॒ प्र नूत॑ना म॒घवा॒ या च॒कार॑ ।\nय॒देददे॑वी॒रस॑हिष्ट मा॒या अथा॑भव॒त् केव॑लः॒ सोमो॑ अस्य ॥५॥\nतवे॒दं विश्व॑म॒भितः॑ पश॒व्यं॑१ यत् पश्य॑सि॒ चक्ष॑सा॒ सूर्य॑स्य ।\nगवा॑मसि॒ गोप॑ति॒रेक॑ इन्द्र भक्षी॒महि॑ ते॒ प्रय॑तस्य॒ वस्वः॑ ॥६॥\nबृह॑स्पते यु॒वमिन्द्र॑श्च॒ वस्वो॑ दि॒व्यस्ये॑शाथे उ॒त पार्थि॑वस्य ।\nध॒त्तं र॒यिं स्तु॑व॒ते की॒रये॑ चिद् यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥७॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 88,
"text": "यस्त॒स्तम्भ॒ सह॑सा॒ वि ज्मो अन्ता॒न् बृह॒स्पति॑स्त्रिषध॒स्थो रवे॑ण ।\nतं प्र॒त्नास॒ ऋष॑यो॒ दीध्या॑नाः पु॒रो विप्रा॑ दधिरे म॒न्द्रजि॑ह्वम्॥१॥\nधु॒नेत॑यः सुप्रके॒तं मद॑न्तो॒ बृह॑स्पते अ॒भि ये न॑स्तत॒स्रे।\nपृष॑न्तं सृ॒प्रमद॑ब्धमू॒र्वं बृह॑स्पते॒ रक्ष॑तादस्य॒ योनि॑म्॥२॥\nबृह॑स्पते॒ या प॑र॒मा प॑रा॒वदत॒ आ त॑ ऋत॒स्पृशो॒ नि षे॑दुः ।\nतुभ्यं॑ खा॒ता अ॑व॒ता अद्रि॑दुग्धा॒ मध्व॑ श्चोतन्त्य॒भितो॑ विर॒प्शम्॥३॥\nबृह॒स्पतिः॑ प्रथ॒मं जाय॑मानो म॒हो ज्योति॑षः पर॒मे व्योऽमन्।\nस॒प्तास्य॑स्तुविजा॒तो रवे॑ण॒ वि स॒प्तर॑श्मिरधम॒त् तमां॑सि ॥४॥\nस सु॒ष्टुभा॒ स ऋक्व॑ता ग॒णेन॑ व॒लं रु॑रोज फलि॒गं रवे॑ण ।\nबृह॒स्पति॑रु॒स्रिया॑ हव्य॒सूदः॒ कनि॑क्रद॒द् वाव॑शती॒रुदा॑जत्॥५॥\nए॒वा पि॒त्रे वि॒श्वदे॑वाय॒ वृष्णे॑ य॒ज्ञैर्विधेम॒ नम॑सा ह॒विर्भिः॑ ।\nबृह॑स्पते सुप्र॒जा वी॒रव॑न्तो व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम्॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 89,
"text": "अस्ते॑व॒ सु प्र॑त॒रं लाय॒मस्य॒न् भूष॑न्निव॒ प्र भ॑रा॒ स्तोम॑मस्मै ।\nवा॒चा वि॑प्रास्तरत॒ वाच॑म॒र्यो नि रा॑मय जरितः॒ सोम॒ इन्द्र॑म्॥१॥\nदोहे॑न॒ गामुप॑ शिक्षा॒ सखा॑यं॒ प्र बो॑धय जरितर्जा॒रमिन्द्र॑म्।\nकोशं॒ न पू॒र्णं वसु॑ना॒ न्यृ॑ष्ट॒मा च्या॑वय मघ॒देया॑य॒ शूर॑म्॥२॥\nकिम॒ङ्ग त्वा॑ मघवन् भो॒जमा॑हुः शिशी॒हि मा॑ शिश॒यं त्वा॑ शृणोमि ।\nअप्न॑स्वती॒ मम॒ धीर॑स्तु शक्र वसु॒विदं॒ भग॑मि॒न्द्रा भ॑रा नः ॥३॥\nत्वां जना॑ ममस॒त्येष्वि॑न्द्र संतस्था॒ना वि ह्व॑यन्ते समी॒के।\nअत्रा॒ युजं॑ कृणुते॒ यो ह॒विष्मा॒न्नासु॑न्वता स॒ख्यं व॑ष्टि॒ शूरः॑ ॥४॥\nधनं॒ न स्प॒न्द्रं ब॑हु॒लं यो अ॑स्मै ती॒व्रान्त्सोमां॑ आसु॒नोति॒ प्रय॑स्वान्।\nतस्मै॒ शत्रू॑न्त्सु॒तुका॑न् प्रा॒तरह्नो॒ नि स्वष्ट्रा॑न् यु॒वति॒ हन्ति॑ वृ॒त्रम्॥५॥\nयस्मि॑न् व॒यं द॑धि॒मा शंस॒मिन्द्रे॒ यः शि॒श्राय॑ म॒घवा॒ काम॑म॒स्मे।\nआ॒राच्चि॒त् सन् भ॑यतामस्य॒ शत्रु॒र्न्यऽस्मै द्यु॒म्ना जन्या॑ नमन्ताम्॥६॥\nआ॒राच्छत्रु॒मप॑ बाधस्व दू॒रमु॒ग्रो यः शम्बः॑ पुरुहूत॒ तेन॑ ।\nअ॒स्मे धे॑हि॒ यव॑म॒द् गोमदिन्द्र कृ॒धी धियं॑ जरि॒त्रे वाज॑रत्नाम्॥७॥\nप्र यम॒न्तर्वृ॑षस॒वासो॒ अग्म॑न् ती॒व्राः सोमा॑ बहु॒लान्ता॑स॒ इन्द्र॑म्।\nनाह॑ दा॒मानं॑ म॒घवा॒ नि यं॑स॒न् नि सु॑न्व॒ते व॑हति॒ भूरि॑ वा॒मम्॥८॥\nउ॒त प्र॒हामति॑दीवा जयति कृ॒तमि॑व श्व॒घ्नी वि चि॑नोति काले।\nयो दे॒वका॑मो॒ न धनं॑ रु॒णद्धि॒ समित् तं रा॒यः सृ॑जति स्व॒धाभिः॑ ॥९॥\nगोभि॑ष्टरे॒माम॑तिं दु॒रेवां॒ यवे॑न वा॒ क्षुधं॑ पुरुहूत॒ विश्वे॑ ।\nव॒यं राज॑सु प्रथ॒मा धना॒न्यरि॑ष्टासो वृज॒नीभि॑र्जयेम ॥१०॥\nबृह॒स्पति॑र्नः॒ परि॑ पातु प॒श्चादु॒तोत्त॑रस्मा॒दध॑रादघा॒योः ।\nइन्द्रः॑ पु॒रस्ता॑दु॒त म॑ध्य॒तो नः॒ सखा॒ सखि॑भ्यो॒ वरी॑यः कृणोतु ॥११॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 90,
"text": "यो अ॑द्रि॒भित् प्र॑थम॒जा ऋ॒तावा॒ बृह॒स्पति॑राङ्गिर॒सो ह॒विष्मा॑न्।\nद्वि॒बर्ह॑ज्मा प्राघर्म॒सत् पि॒ता न॒ आ रोद॑सी वृष॒भो रो॑रवीति ॥१॥\nजना॑य चि॒द् य ईव॑ते उ लो॒कं बृह॒स्पति॑र्दे॒वहू॑तौ च॒कार॑ ।\nघ्नन् वृ॒त्राणि॒ वि पुरो॑ दर्दरीति॒ जयं॒ छत्रूं॑र॒मित्रा॑न् पृ॒त्सु साह॑न्॥२॥\nबृह॒स्पतिः॒ सम॑जय॒द् वसू॑नि म॒हो व्र॒जान् गोम॑तो दे॒व ए॒षः ।\nअ॒पः सिषा॑स॒न्त्स्व॑१रप्र॑तीतो॒ बृह॒स्पति॒र्हन्त्य॒मित्र॑म॒र्कैः ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 91,
"text": "इ॒मां धियं॑ स॒प्तशी॑र्ष्णीं पि॒ता न॑ ऋ॒तप्र॑जातां बृह॒तीम॑विन्दत्।\nतु॒रीयं॑ स्विज्जनयद् वि॒श्वज॑न्यो॒ऽयास्य॑ उ॒क्थमिन्द्रा॑य॒ शं॑सन्॥१॥\nऋ॒तं शंस॑न्त ऋ॒जु दीध्या॑ना दि॒वस्पु॒त्रासो॒ असु॑रस्य वी॒राः ।\nविप्रं॑ प॒दमङ्गि॑रसो॒ दधा॑ना य॒ज्ञस्य॒ धाम॑ प्रथ॒मं म॑नन्त ॥२॥\nहं॒सैरि॑व॒ सखि॑भि॒र्वाव॑दद्भिरश्म॒न्मया॑नि॒ नह॑ना॒ व्यस्य॑न्।\nबृह॒स्पति॑रभि॒कनि॑क्रद॒द् गा उ॒त प्रास्तौ॒दुच्च॑ वि॒द्वां अ॑गायत्॥३॥\nअ॒वो द्वाभ्यां॑ प॒र एक॑या॒ गा गुहा॒ तिष्ठ॑न्ती॒रनृ॑तस्य॒ सेतौ॑ ।\nबृह॒स्पति॒स्तम॑सि॒ ज्योति॑रि॒च्छन्नुदु॒स्रा आक॒र्वि हि ति॒स्र आवः॑ ॥४॥\nवि॒भिद्या॒ पुरं॑ श॒यथे॒मपा॑चीं॒ निस्त्रीणि॑ सा॒कमु॑द॒धेर॑कृन्तत्।\nबृह॒स्पति॑रु॒षसं॒ सूर्यं॒ गाम॒र्कं वि॑वेद स्त॒नय॑न्निव॒ द्यौः ॥५॥\nइन्द्रो॑ व॒लं र॑क्षि॒तारं॒ दुघा॑नां क॒रेणे॑व॒ वि च॑कर्ता॒ रवे॑ण ।\nस्वेदा॑ञ्जिभिरा॒शिर॑मि॒च्छमा॒नोऽरो॑दयत् प॒णिमा गा अ॑मुष्णात्॥६॥\nस ईं॑ स॒त्येभिः॒ सखि॑भिः शु॒चद्भि॒र्गोधा॑यसं॒ वि ध॑न॒सैर॑दर्दः ।\nब्रह्म॑ण॒स्पति॒र्वृष॑भिर्व॒राहै॑र्घ॒र्मस्वे॑देभि॒र्द्रवि॑णं॒ व्याऽनट्॥७॥\nते स॒त्येन॒ मन॑सा॒ गो॑पतिं॒ गा इ॑या॒नास॑ इषणयन्त धी॒भिः ।\nबृह॒स्पति॑र्मि॒थोअ॑वद्यपेभि॒रुदु॒स्रिया॑ असृजत स्व॒युग्भिः॑ ॥८॥\nतं व॒र्धय॑न्तो म॒तिभिः॑ शि॒वाभिः॑ सिं॒हमि॑व॒ नान॑दतं स॒धस्थे॑ ।\nबृह॒स्पतिं॒ वृष॑णं॒ शूर॑सातौ॒ भरे॑भरे॒ अनु॑ मदेम जि॒ष्णुम्॥९॥\nय॒दा वाज॒मस॑नद् वि॒श्वरू॑प॒मा द्यामरु॑क्ष॒दुत्त॑राणि॒ सद्म॑ ।\nबृह॒स्पतिं॒ वृष॑णं व॒र्धय॑न्तो॒ नाना॒ सन्तो॒ बिभ्र॑तो॒ ज्योति॑रा॒सा॥१०॥\nस॒त्यमा॒शिषं॑ कृणुता वयो॒धै की॒रिं चि॒द्ध्यव॑थ॒ स्वेभि॒रेवैः॑ ।\nप॒श्चा मृधो॒ अप॑ भवन्तु॒ विश्वा॒स्तद् रो॑दसी शृणुतं विश्वमि॒न्वे॥११॥\nइन्द्रो॑ म॒ह्ना म॑ह॒तो अ॑र्ण॒वस्य॒ वि मू॒र्धान॑मभिनदर्बु॒दस्य॑ ।\nअह॒न्नहि॒मरि॑णात् सप्त सिन्धू॑न् दे॒वैर्द्या॑वापृथिवी॒ प्राव॑तं नः ॥१२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 92,
"text": "अ॒भि प्र गोप॑तिं गि॒रेन्द्र॑मर्च॒ यथा॑ वि॒दे। सू॒तुं स॒त्यस्य॒ सत्प॑तिम्॥१॥\nआ ह॑रयः ससृज्रि॒रेऽरु॑षी॒रधि॑ ब॒र्हिषि॑ । यत्रा॒भि सं॒नवा॑महे ॥२॥\nइन्द्रा॑य॒ गाव॑ आ॒शिरं॑ दुदु॒ह्रे व॒ज्रिणे॒ मधु॑ । यत् सी॑मुपह्व॒रे वि॒दत्॥३॥\nउद् यद् ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टपं॑ गृ॒हमिन्द्र॑श्च॒ गन्व॑हि ।\nमध्वः॑ पी॒त्वा स॑चेवहि॒ त्रिः स॒प्त सख्युः॑ प॒दे॥४॥\nअर्च॑त॒ प्रार्च॑त॒ प्रिय॑मेधासो॒ अर्च॑त । अर्च॑न्तु पुत्र॒का उ॒त पुरं॒ न धृ॒ष्ण्वऽर्चत ॥५॥\nअव॑ स्वराति॒ गर्ग॑रो गो॒धा परि॑ सनिष्वणत्।\nपिङ्गा॒ परि॑ चनिष्कद॒दिन्द्रा॑य॒ ब्रह्मोद्य॑तम्॥६॥\nआ यत् पत॑न्त्ये॒न्यः सु॒दुघा॒ अन॑पस्फुरः ।\nअ॒प॒स्फुरं॑ गृभायत॒ सोम॒मिन्द्रा॑य॒ पात॑वे ॥७॥\nअपा॒दिन्द्रो॒ अपा॑द॒ग्निर्विश्वे॑ दे॒वा अ॑मत्सत ।\nवरु॑ण॒ इदि॒ह क्ष॑य॒त् तमापो॑ अ॒भ्यऽनूषत व॒त्सं सं॒शिश्व॑रीरिव ॥८॥\nसु॒दे॒वो अ॑सि वरुण॒ यस्य॑ ते स॒प्त सिन्ध॑वः ।\nअ॒नु॒क्षर॑न्ति का॒कुदं॑ सू॒र्यं सुषि॒रामि॑व ॥९॥\nयो व्यतीं॒रफा॑णय॒त् सुयु॑क्तां॒ उप॑ दा॒शुषे॑ ।\nत॒क्वो ने॒ता तदिद् वपु॑रुप॒मा यो अमु॑च्यत ॥१०॥\nअतीदु॑ श॒क्र ओ॑हत॒ इन्द्रो॒ विश्वा॒ अति॒ द्विषः॑ ।\nभि॒नत् क॒नीन॑ ओद॒नं प॒च्यमा॑नं प॒रो गि॒रा॥११॥\nअ॒र्भ॒को न कु॑मार॒कोऽधि॑ तिष्ठ॒न्नवं॒ रथ॑म्।\nस प॑क्षन्महि॒षं मृ॒गं पि॒त्रे मा॒त्रे वि॑भु॒क्रतु॑म्॥१२॥\nआ तू सु॑शिप्र दंपते॒ रथं॑ तिष्ठा हिर॒ण्यय॑म्।\nअध॑ द्यु॒क्षं स॑चेवहि स॒हस्र॑पादमरु॒षं स्व॑स्ति॒गाम॑ने॒हस॑म्॥१३॥\nतं घे॑मि॒त्था न॑म॒स्विन॒ उप॑ स्व॒राज॑मासते ।\nअर्थं॑ चिदस्य॒ सुधि॑तं॒ यदेत॑व आव॒र्तय॑न्ति दा॒वने॑ ॥१४॥\nअनु॑ प्र॒त्नस्यौक॑सः प्रि॒यमे॑धास एषाम्।\nपूर्वा॒मनु॒ प्रय॑तिं वृ॒क्तब॑र्हिषो हि॒तप्र॑यस आशत ॥१५॥\nयो राजा॑ चर्षणी॒नां याता॒ रथे॑भि॒रध्रि॑गुः ।\nविश्वा॑सां तरु॒ता पृत॑नानां॒ ज्येष्ठो॒ यो वृ॑त्र॒हा गृ॒णे॥१६॥\nइन्द्रं॒ तं शु॑म्भ पुरुहन्म॒न्नव॑से॒ यस्य॑ द्वि॒ता वि॑ध॒र्तरि॑ ।\nहस्ता॑य॒ वज्रः॒ प्रति॑ धायि दर्श॒तो म॒हो दि॒वे न सूर्यः॑ ॥१७॥\nनकि॒ष्टं कर्म॑णा नश॒द् यश्च॒कार॑ स॒दावृ॑धम्।\nइन्द्रं॒ न य॒ज्ञैर्वि॒श्वगू॑र्त॒मृभ्व॑स॒मधृ॑ष्टं धृ॒ष्ण्वोऽजसम्॥१८॥\nअषा॑ल्हमु॒ग्रं पृत॑नासु सास॒हिं यस्मि॑न् म॒हीरु॑रु॒ज्रयः॑ ।\nसं धे॒नवो॒ जाय॑माने अनोनवु॒र्द्यावः॒ क्षामो॑ अनोनवुः ॥१९॥\nयद् द्याव॑ इन्द्र ते श॒तं श॒तं भूमी॑रु॒त स्युः ।\nन त्वा॑ वज्रिन्त्स॒हस्रं॒ सूर्या॒ अनु॒ न जा॒तम॑ष्ट॒ रोद॑सी ॥२०॥\nआ प॑प्राथ महि॒ना वृष्ण्या॑ वृष॒न् विश्वा॑ शविष्ठ॒ शव॑सा ।\nअ॒स्मां अ॑व मघव॒न् गोम॑ति व्र॒जे वज्रिं॑ चि॒त्राभि॑रू॒तिभिः॑ ॥२१॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 93,
"text": "उत् त्वा॑ मन्दन्तु॒ स्तोमाः॑ कृणु॒ष्व राधो॑ अद्रिवः । अव॑ ब्रह्म॒द्विषो॑ जहि ॥१॥\nप॒दा प॒णींर॑रा॒धसो॒ नि बा॑धस्व म॒हां अ॑सि । न॒हि त्वा॒ कश्च॒न प्रति॑ ॥२॥\nत्वमी॑शिषे सु॒ताना॒मिन्द्र॒ त्वमसु॑तानाम्। त्वं राजा॒ जना॑नाम्॥३॥\nई॒ङ्खय॑न्तीरप॒स्युव॒ इन्द्रं॑ जा॒तमुपा॑सते । भे॒जा॒नासः॑ सु॒वीर्य॑म्॥४॥\nत्वमि॑न्द्र॒ बला॒दधि॒ सह॑सो जा॒त ओज॑सः । त्वं वृ॑ष॒न् वृषेद॑सि ॥५॥\nत्वमि॑न्द्रासि वृत्र॒हा व्य॑१न्तरि॑क्षमतिरः । उद् द्याम॑स्तभ्ना॒ ओज॑सा ॥६॥\nत्वमि॑न्द्र स॒जोष॑सम॒र्कं बि॑भर्षि बा॒ह्वोः । वज्रं॒ शिशा॑न॒ ओज॑सा ॥७॥\nत्वमि॑न्द्राभि॒भूर॑सि॒ विश्वा॑ जा॒तान्योज॑सा । स विश्वा॒ भुव॒ आभ॑वः ॥८॥\nBy Dr. Sachchidanand Pathak, U.P. Sanskrit Sansthan, Lucknow, India.\n\nअ॒भि प्र गोप॑तिं गि॒रेन्द्र॑मर्च॒ यथा॑ वि॒दे। सू॒तुं स॒त्यस्य॒ सत्प॑तिम्॥१॥\nआ ह॑रयः ससृज्रि॒रेऽरु॑षी॒रधि॑ ब॒र्हिषि॑ । यत्रा॒भि सं॒नवा॑महे ॥२॥\nइन्द्रा॑य॒ गाव॑ आ॒शिरं॑ दुदु॒ह्रे व॒ज्रिणे॒ मधु॑ । यत् सी॑मुपह्व॒रे वि॒दत्॥३॥\nउद् यद् ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टपं॑ गृ॒हमिन्द्र॑श्च॒ गन्व॑हि ।\nमध्वः॑ पी॒त्वा स॑चेवहि॒ त्रिः स॒प्त सख्युः॑ प॒दे॥४॥\nअर्च॑त॒ प्रार्च॑त॒ प्रिय॑मेधासो॒ अर्च॑त । अर्च॑न्तु पुत्र॒का उ॒त पुरं॒ न धृ॒ष्ण्वऽर्चत ॥५॥\nअव॑ स्वराति॒ गर्ग॑रो गो॒धा परि॑ सनिष्वणत्।\nपिङ्गा॒ परि॑ चनिष्कद॒दिन्द्रा॑य॒ ब्रह्मोद्य॑तम्॥६॥\nआ यत् पत॑न्त्ये॒न्यः सु॒दुघा॒ अन॑पस्फुरः ।\nअ॒प॒स्फुरं॑ गृभायत॒ सोम॒मिन्द्रा॑य॒ पात॑वे ॥७॥\nअपा॒दिन्द्रो॒ अपा॑द॒ग्निर्विश्वे॑ दे॒वा अ॑मत्सत ।\nवरु॑ण॒ इदि॒ह क्ष॑य॒त् तमापो॑ अ॒भ्यऽनूषत व॒त्सं सं॒शिश्व॑रीरिव ॥८॥\nसु॒दे॒वो अ॑सि वरुण॒ यस्य॑ ते स॒प्त सिन्ध॑वः ।\nअ॒नु॒क्षर॑न्ति का॒कुदं॑ सू॒र्यं सुषि॒रामि॑व ॥९॥\nयो व्यतीं॒रफा॑णय॒त् सुयु॑क्तां॒ उप॑ दा॒शुषे॑ ।\nत॒क्वो ने॒ता तदिद् वपु॑रुप॒मा यो अमु॑च्यत ॥१०॥\nअतीदु॑ श॒क्र ओ॑हत॒ इन्द्रो॒ विश्वा॒ अति॒ द्विषः॑ ।\nभि॒नत् क॒नीन॑ ओद॒नं प॒च्यमा॑नं प॒रो गि॒रा॥११॥\nअ॒र्भ॒को न कु॑मार॒कोऽधि॑ तिष्ठ॒न्नवं॒ रथ॑म्।\nस प॑क्षन्महि॒षं मृ॒गं पि॒त्रे मा॒त्रे वि॑भु॒क्रतु॑म्॥१२॥\nआ तू सु॑शिप्र दंपते॒ रथं॑ तिष्ठा हिर॒ण्यय॑म्।\nअध॑ द्यु॒क्षं स॑चेवहि स॒हस्र॑पादमरु॒षं स्व॑स्ति॒गाम॑ने॒हस॑म्॥१३॥\nतं घे॑मि॒त्था न॑म॒स्विन॒ उप॑ स्व॒राज॑मासते ।\nअर्थं॑ चिदस्य॒ सुधि॑तं॒ यदेत॑व आव॒र्तय॑न्ति दा॒वने॑ ॥१४॥\nअनु॑ प्र॒त्नस्यौक॑सः प्रि॒यमे॑धास एषाम्।\nपूर्वा॒मनु॒ प्रय॑तिं वृ॒क्तब॑र्हिषो हि॒तप्र॑यस आशत ॥१५॥\nयो राजा॑ चर्षणी॒नां याता॒ रथे॑भि॒रध्रि॑गुः ।\nविश्वा॑सां तरु॒ता पृत॑नानां॒ ज्येष्ठो॒ यो वृ॑त्र॒हा गृ॒णे॥१६॥\nइन्द्रं॒ तं शु॑म्भ पुरुहन्म॒न्नव॑से॒ यस्य॑ द्वि॒ता वि॑ध॒र्तरि॑ ।\nहस्ता॑य॒ वज्रः॒ प्रति॑ धायि दर्श॒तो म॒हो दि॒वे न सूर्यः॑ ॥१७॥\nनकि॒ष्टं कर्म॑णा नश॒द् यश्च॒कार॑ स॒दावृ॑धम्।\nइन्द्रं॒ न य॒ज्ञैर्वि॒श्वगू॑र्त॒मृभ्व॑स॒मधृ॑ष्टं धृ॒ष्ण्वोऽजसम्॥१८॥\nअषा॑ल्हमु॒ग्रं पृत॑नासु सास॒हिं यस्मि॑न् म॒हीरु॑रु॒ज्रयः॑ ।\nसं धे॒नवो॒ जाय॑माने अनोनवु॒र्द्यावः॒ क्षामो॑ अनोनवुः ॥१९॥\nयद् द्याव॑ इन्द्र ते श॒तं श॒तं भूमी॑रु॒त स्युः ।\nन त्वा॑ वज्रिन्त्स॒हस्रं॒ सूर्या॒ अनु॒ न जा॒तम॑ष्ट॒ रोद॑सी ॥२०॥\nआ प॑प्राथ महि॒ना वृष्ण्या॑ वृष॒न् विश्वा॑ शविष्ठ॒ शव॑सा ।\nअ॒स्मां अ॑व मघव॒न् गोम॑ति व्र॒जे वज्रिं॑ चि॒त्राभि॑रू॒तिभिः॑ ॥२१॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 94,
"text": "आ या॒त्विन्द्रः॒ स्वप॑ति॒र्मदा॑य॒ यो धर्म॑णा तूतुजा॒नस्तुवि॑ष्मान्।\nप्र॒त्व॒क्षा॒णो अति॒ विश्वा॒ सहां॑स्यपा॒रेण॑ मह॒ता वृष्ण्ये॑न ॥१॥\nसु॒ष्ठामा॒ रथः॑ सु॒यमा॒ हरी॑ ते मि॒म्यक्ष॒ वज्रो॑ नृप॑ते॒ गभ॑स्तौ ।\nशीभं॑ राजन् सु॒पथा या॑ह्य॒र्वाङ् वर्धा॑म ते प॒पुषो॒ वृष्ण्या॑नि ॥२॥\nएन्द्र॒वाहो॑ नृ॒पतिं॒ वज्र॑बाहुमु॒ग्रमु॒ग्रास॑स्तवि॒षास॑ एनम्।\nप्रत्व॑क्षसं वृष॒भं स॒त्यशु॑ष्म॒मेम॑स्म॒त्रा स॑ध॒मादो॑ वहन्तु ॥३॥\nए॒वा पतिं॑ द्रोण॒साचं॒ सचे॑तसमू॒र्ज स्क॒म्भं ध॒रुण॒ आ वृ॑षायसे ।\nओजः॑ कृष्व॒ सं गृ॑भाय॒ त्वे अप्यसो॒ यथा॑ केनि॒पाना॑मि॒नो वृ॒धे॥४॥\nगम॑न्न॒स्मे वसू॒न्या हि शंसि॑षं स्वा॒शिषं॒ भर॒मा या॑हि सो॒मिनः॑ ।\nत्वमी॑शिषे॒ सास्मिन्ना स॑त्सि ब॒र्हिष्य॑नाधृ॒ष्या तव॒ पात्रा॑णि॒ धर्म॑णा ॥५॥\nपृथ॒क् प्राय॑न् प्रथ॒मा दे॒वहू॑त॒योऽकृ॑ण्वत श्रव॒स्याऽनि दु॒ष्टरा॑ ।\nन ये शे॒कुर्य॒ज्ञियां॒ नाव॑मा॒रुह॑मी॒र्मैव ते न्य॑विशन्त॒ केप॑यः ॥६॥\nए॒वैवापा॒गप॑रे सन्तु दू॒ढ्योऽश्वा॒ येषां॑ दु॒र्युज॑ आयुयु॒ज्रे।\nइ॒त्था ये प्रागुप॑रे॒ सन्ति॑ दा॒वने॑ पु॒रूणि॒ यत्र॑ व॒युना॑नि॒ भोज॑ना ॥७॥\nगि॒रींरज्रा॒न् रेज॑मानां अधारय॒द् द्यौः क्र॑न्दद॒न्तरि॑क्षाणि कोपयत्।\nस॒मी॒ची॒ने धि॒षणे॒ वि ष्क॑भायति॒ वृष्णः॑ पी॒त्वा मद॑ उ॒क्थानि॑ शंसति ॥८॥\nइ॒मं बि॑भर्मि॒ सुकृ॑तं ते अङ्कु॒शं येना॑रु॒जासि॑ मघवं छफा॒रुजः॑ ।\nअ॒स्मिन्त्सु ते॒ सव॑ने अस्त्वो॒क्त्यं सु॒त इ॒ष्टौ म॑घवन् बो॒ध्याभ॑गः ॥९॥\nगोभि॑ष्टरे॒माम॑तिं दु॒रेवां॒ यवे॑न॒ क्षुधं॑ पुरुहूत॒ विश्वा॑म्।\nव॒यं राज॑भिः प्रथ॒मा धना॑न्य॒स्माके॑न वृ॒जने॑ना जयेम ॥१०॥\nबृह॒स्पति॑र्नः॒ परि॑ पातु प॒श्चादु॒तोत्त॑रस्मा॒दध॑रादघा॒योः ।\nइन्द्रः॑ पु॒रस्ता॑दु॒त म॑ध्य॒तो नः॒ सखा॒ सखि॑भ्यो॒ वरि॑वः कृणोतु ॥११॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 95,
"text": "त्रिक॑द्रुकेषु महि॒षो यवा॑शिरं तुवि॒शुष्म॑स्तृ॒पत् सोम॑मपिब॒द् विष्णु॑ना सु॒तं यथाव॑शत्।\nस ईं॑ ममाद॒ महि॒ कर्म॒ कर्त॑वे म॒हामु॒रुं सैनं॑ सश्चद् दे॒वो दे॒वं स॒त्यमिन्द्रं॑ स॒त्य इन्दुः॑ ॥१॥\nप्रो ष्व॑स्मै पुरोर॒थमिन्द्रा॑य शू॒षम॑र्चत ।\nअ॒भीके॑ चिदु लोक॒कृत् सं॒गे स॒मत्सु॑ वृत्र॒हास्माकं॑ बोधि चोदि॒ता\nनभ॑न्तामन्य॒केषां॑ ज्या॒का अधि॒ धन्व॑सु ॥२॥\nत्वं सिन्धूं॒रवा॑सृजोऽध॒राचो॒ अह॒न्नहि॑म्।\nअ॒श॒त्रुरि॑न्द्र जज्ञिषे॒ विश्वं॑ पुष्यसि॒ वार्यं॒ तं त्वा॒ परि॑ ष्वजामहे॒\nनभ॑न्तामन्य॒केषां॑ ज्या॒का अधि॒ धन्व॑सु ॥३॥\nवि षु विश्वा॒ अरा॑तयो॒ऽर्यो न॑शन्त नो॒ धियः॑ ।\nअस्ता॑सि॒ शत्र॑वे व॒धं यो न॑ इन्द्र॒ जिघां॑सति॒ या ते॑ रा॒तिर्द॒दिर्वसु॒\nनभ॑न्तामन्य॒केषां॑ ज्या॒का अधि॒ धन्व॑सु ॥४॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 96,
"text": "ती॒व्रस्या॒भिव॑यसो अ॒स्य पा॑हि सर्वर॒था वि हरी॑ इ॒ह मु॑ञ्च ।\nइन्द्र॒ मा त्वा॒ यज॑मानासो अ॒न्ये नि री॑रम॒न् तुभ्य॑मि॒मे सु॒तासः॑ ॥१॥\nतुभ्यं॑ सु॒तास्तुभ्य॑मु॒ सोत्वा॑स॒स्त्वां गिरः॒ श्वात्र्या॒ आ ह्व॑यन्ति ।\nइन्द्रे॒दम॒द्य सव॑नं जुषा॒णो विश्व॑स्य वि॒द्वां इ॒ह पा॑हि॒ सोम॑म्॥२॥\nय उ॑श॒ता मन॑सा॒ सोम॑मस्मै सर्वहृ॒दा दे॒वका॑मः सु॒नोति॑ ।\nन गा इन्द्र॒स्तस्य॒ परा॑ ददाति प्रश॒स्तमिच्चारु॑मस्मै कृणोति ॥३॥\nअनु॑स्पष्टो भवत्ये॒षो अ॑स्य॒ यो अ॑स्मै रे॒वान् न सु॒नोति॒ सोम॑म्।\nनिर॑र॒त्नौ म॒घवा॒ तं द॑धाति ब्रह्म॒द्विषो॑ ह॒न्त्यना॑नुदिष्टः ॥४॥\nअ॒श्वा॒यन्तो॑ ग॒व्यन्तो॑ वा॒जय॑न्तो॒ हवा॑महे॒ त्वोप॑गन्त॒वा उ॑ ।\nआ॒भूष॑न्तस्ते सुम॒तौ नवा॑यां व॒यमि॑न्द्र त्वा शु॒नं हु॑वेम ॥५॥\nमु॒ञ्चामि॑ त्वा ह॒विषा॒ जीव॑नाय॒ कम॑ज्ञातय॒क्ष्मादु॒त रा॑जय॒क्ष्मात्।\nग्राहि॑र्ज॒ग्राह॒ यद्ये॒तदे॑नं तस्या॑ इन्द्राग्नी॒ प्र मु॑मुक्तमेनम्॥६॥\nयदि॑ क्षि॒तायु॒र्यदि॑ वा॒ परे॑तो॒ यदि॑ मृ॒त्योर॑न्ति॒कं नीऽत ए॒व।\nतमा ह॑रामि॒ निरृ॑तेरु॒पस्था॒दस्पा॑र्शमेनं श॒तशा॑रदाय ॥७॥\nस॒ह॒स्रा॒क्षेण॑ श॒तवी॑र्येण श॒तायु॑षा ह॒विषाहा॑र्षमेनम्।\nइन्द्रो॒ यथै॑नं श॒रदो॒ नया॒त्यति॒ विश्व॑स्य दुरि॒तस्य॑ पा॒रम्॥८॥\nश॒तं जी॑व श॒रदो॒ वर्ध॑मानः श॒तं हे॑म॒न्तान्छ॒तमु॑ वस॒न्तान्।\nश॒तं त॒ इन्द्रो॑ अ॒ग्निः स॑वि॒ता बृह॒स्पतिः॑ श॒तायु॑षा ह॒विषाहा॑र्षमेनम्॥९॥\nआहा॑र्ष॒मवि॑दं त्वा॒ पुन॒रागाः॒ पुन॑र्णवः ।\nसर्वा॑ङ्ग॒ सर्वं॑ ते॒ चक्षुः॒ सर्व॒मायु॑श्च तेऽविदम्॥१०॥\nब्रह्म॑णा॒ग्निः स॑म्विदा॒नो र॑क्षो॒हा बा॑धतामि॒तः ।\nअमी॑वा॒ यस्ते॒ गर्भं॑ दु॒र्णामा॒ योनि॑मा॒शये॑ ॥११॥\nयस्ते॒ गर्भ॒ममी॑वा दु॒र्णामा॒ योनि॑मा॒शये॑ ।\nअ॒ग्निष्टं ब्रह्म॑णा स॒ह निष्क्र॒व्याद॑मनीनशत्॥१२॥\nयस्ते॒ हन्ति॑ प॒तय॑न्तं निष॒त्स्नुं यः स॑रीसृ॒पम्।\nजा॒तं यस्ते॒ जिघां॑सति॒ तमि॒तो ना॑शयामसि ॥१३॥\nयस्त॑ ऊ॒रू वि॒हर॑त्यन्त॒रा दम्प॑ती॒ शये॑ ।\nयोनिं॒ यो अ॒न्तरा॒रेल्हि॒ तमि॒तो ना॑शयामसि ॥१४॥\nयस्त्वा॒ भ्राता॒ पति॑र्भू॒त्वा जा॒रो भू॒त्वा नि॒पद्य॑ते ।\nप्र॒जां यस्ते॒ जिघां॑सति॒ तमि॒तो ना॑शयामसि ॥१५॥\nयस्त्वा॒ स्वप्ने॑न॒ तम॑सा मोहयि॒त्वा नि॒पद्य॑ते ।\nप्र॒जां यस्ते॒ जिघां॑सति॒ तमि॒तो ना॑शयामसि ॥१६॥\nअ॒क्षीभ्यां॑ ते॒ नासि॑काभ्यां॒ कर्णा॑भ्यां॒ छुबु॑का॒दधि॑ ।\nयक्ष्मं॑ शीर्ष॒ण्यं म॒स्तिष्का॑ज्जि॒ह्वाया॒ वि वृ॑हामि ते ॥१७॥\nग्री॒वाभ्य॑स्त उ॒ष्णिहा॑भ्यः॒ कीक॑साभ्यो अनू॒क्याऽत्।\nयक्ष्मं॑ दोष॒ण्य॑१मंसा॑भ्यां बा॒हुभ्यां॒ वि वृ॑हामि ते ॥१८॥\nहृद॑यात् ते॒ परि॑ क्लो॒म्नो हली॑क्ष्णात् पा॒र्श्वाभ्या॑म्।\nयक्ष्मं॒ मत॑स्नाभ्यां प्ली॒ह्नो य॒क्नस्ते॒ वि वृ॑हामसि ॥१९॥\nआ॒न्त्रेभ्य॑स्ते॒ गुदा॑भ्यो वनि॒ष्ठोरु॒दरा॒दधि॑ ।\nयक्ष्मं॑ कु॒क्षिभ्यां॑ प्ला॒शेर्नाभ्या॒ वि वृ॑हामि ते ॥२०॥\nऊ॒रुभ्यां॑ ते अष्ठी॒वद्भ्यां॒ पार्ष्णिभ्यां॒ प्रप॑दाभ्याम्।\nयक्ष्मं॑ भस॒द्यं॑१ श्रोणि॑भ्यां॒ भास॑दं॒ भंस॑सो॒ वि वृ॑हामि ते ॥२१॥\nअ॒स्थिभ्य॑स्ते म॒ज्जभ्यः॒ स्नाव॑भ्यो ध॒मनि॑भ्यः\nयक्ष्मं॑ पा॒णिभ्या॑म॒ङ्गुलि॑भ्यो न॒खेभ्यो॒ वि वृ॑हामि ते ॥२२॥\nअङ्गे॑अङ्गे॒ लोम्नि॑लोम्नि॒ यस्ते॒ पर्व॑णिपर्वणि ।\nयक्षं॑ त्वच॒स्यं ते व॒यं क॒श्यप॑स्य वीब॒र्हेण॒ विष्व॑ञ्चं॒ वि वृ॑हामसि ॥२३॥\nअपे॑हि मनसस्प॒तेऽप॑ क्राम प॒रश्च॑र ।\nप॒रो निरृ॑त्या॒ आ च॑क्ष्व बहु॒धा जीव॑तो॒ मनः॑ ॥२४॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 97,
"text": "व॒यमे॑नमि॒दा ह्योपी॑पेमे॒ह व॒ज्रिण॑म्।\nतस्मा॑ उ अ॒द्य स॑म॒ना सु॒तं भ॒रा नू॒नं भू॑षत श्रु॒ते॥१॥\nवृक॑श्चिदस्य वार॒ण उ॑रा॒मथि॒रा व॒युने॑षु भूषति ।\nसेमं नः॒ स्तोमं॑ जुजुषा॒ण आ ग॒हीन्द्र॒ प्र चि॒त्रया॑ धि॒या॥२॥\nकदू॒ न्व॑१स्याकृ॑त॒मिन्द्र॑स्यास्ति॒ पौंस्य॑म्।\nकेनो॒ नु कं॒ श्रोम॑तेन॒ न शु॑श्रुवे ज॒नुषः॒ परि॑ वृत्र॒हा॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 98,
"text": "व॒यमे॑नमि॒दा ह्योपी॑पेमे॒ह व॒ज्रिण॑म्।\nतस्मा॑ उ अ॒द्य स॑म॒ना सु॒तं भ॒रा नू॒नं भू॑षत श्रु॒ते॥१॥\nवृक॑श्चिदस्य वार॒ण उ॑रा॒मथि॒रा व॒युने॑षु भूषति ।\nसेमं नः॒ स्तोमं॑ जुजुषा॒ण आ ग॒हीन्द्र॒ प्र चि॒त्रया॑ धि॒या॥२॥\nकदू॒ न्व॑१स्याकृ॑त॒मिन्द्र॑स्यास्ति॒ पौंस्य॑म्।\nकेनो॒ नु कं॒ श्रोम॑तेन॒ न शु॑श्रुवे ज॒नुषः॒ परि॑ वृत्र॒हा॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 99,
"text": "अ॒भि त्वा॑ पू॒र्वपी॑तय॒ इन्द्र॒ स्तोमे॑भिरा॒यवः॑ ।\nस॒मी॒ची॒नास॑ ऋ॒भवः॒ सम॑स्वरन् रु॒द्रा गृ॑णन्त॒ पूर्व्य॑म्॥१॥\nअ॒स्येदिन्द्रो॑ वावृधे॒ वृष्ण्यं॒ शवो॒ मदे॑ सु॒तस्य॒ विष्ण॑वि ।\nअ॒द्या तम॑स्य महि॒मान॑मा॒यवोऽनु॑ ष्टुवन्ति पू॒र्वथा॑ ॥२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 100,
"text": "अधा॒ ही॑न्द्र गिर्वण॒ उप॑ त्वा॒ कामा॑न् म॒हः स॑सृ॒ज्महे॑ । उ॒देव॒ यन्त॑ उ॒दभिः॑ ॥१॥\nवार्ण त्वा॑ य॒व्याभि॒र्वर्ध॑न्ति शूर॒ ब्रह्मा॑णि । वा॒वृ॒ध्वांसं॑ चिदद्रिवो दि॒वेदि॑वे ॥२॥\nयु॒ञ्जन्ति॒ हरी॑ इषि॒रस्य॒ गाथ॑यो॒रौ रथ॑ उ॒रुयु॑गे ।इ॒न्द्रवाहा॑ वचो॒युजा॑ ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 101,
"text": "अ॒ग्निं दू॒तं वृ॑णीमहे॒ होता॑रं वि॒श्ववे॑दसम्। अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु॑म्॥१॥\nअ॒ग्निम॑ग्निं॒ हवी॑मभिः॒ सदा॑ हवन्त वि॒श्पति॑म्। ह॒व्य॒वाहं॑ पुरुप्रि॒यम्॥२॥\nअग्ने॑ दे॒वां इ॒हा व॑ह जज्ञा॒नो वृ॒क्तब॑र्हिषे । असि॒ होता॑ न॒ ईड्यः॑ ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 102,
"text": "ई॒लेन्यो॑ नम॒स्यऽस्ति॒रस्तमां॑सि दर्श॒तः । सम॒ग्निरि॑ध्यते॒ वृषा॑ ॥१॥\nवृषो॑ अ॒ग्निः समि॑ध्य॒तेऽश्वो॒ न दे॑व॒वाह॑नः । तं ह॒विष्म॑न्तः ईलते ॥२॥\nवृष॑णं त्वा व॒यं वृ॑ष॒न् वृष॑णः॒ समि॑धीमहि । अग्ने॒ दीद्य॑तं बृ॒हत्॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 103,
"text": "अ॒ग्निमी॑लि॒ष्वाव॑से॒ गाथा॑भिः शी॒रशो॑चिषम्।\nअ॒ग्निं रा॒ये पु॑रुमील्ह श्रु॒तं नरो॒ऽग्निं सु॑दी॒तये॑ छ॒र्दिः ॥१॥\nअग्न॒ आ या॑ह्य॒ग्निभि॒र्होता॑रं त्वा वृणीमहे ।\nआ त्वाम॑नक्तु॒ प्रय॑ता ह॒विष्म॑ती॒ यजि॑ष्ठं ब॒र्हिरा॒सदे॑ ॥२॥\nअच्छा॒ हि त्वा॑ सहसः सूनो अङ्गिरः॒ स्रुच॒श्चर॑न्त्यध्व॒रे।\nऊ॒र्जो नपा॑तं घृ॒तके॑शमीमहे॒ऽग्निं य॒ज्ञेषु॑ पू॒र्व्यम्॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 104,
"text": "इ॒मा उ॑ त्वा पुरूवसो॒ गिरो॑ वर्धन्तु॒ या मम॑ ।\nपा॒व॒कव॑र्णाः॒ शुच॑यो विप॒श्चितो॒ऽभि स्तोमै॑रनूषत ॥१॥\nअ॒यं स॒हस्र॒मृषि॑भिः॒ सह॑स्कृतः समु॒द्र इ॑व पप्रथे ।\nस॒त्यः सो अ॑स्य महि॒मा गृ॑णे॒ शवो॑ य॒ज्ञेषु॑ विप्र॒राज्ये॑ ॥२॥\nआ नो॒ विश्वा॑सु॒ हव्य॒ इन्द्रः॑ स॒मत्सु॑ भूषतु ।\nउप॒ ब्रह्मा॑णि॒ सव॑नानि वृत्र॒हा प॑रम॒ज्या ऋची॑षमः ॥३॥\nत्वं दा॒ता प्र॑थ॒मो राध॑साम॒स्यसि॑ स॒त्य ई॑शान॒कृत्।\nतु॒वि॒द्यु॒म्नस्य॒ युज्या वृ॑णीमहे पु॒त्रस्य॒ शव॑सो म॒हः ॥४॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 105,
"text": "त्वमि॑न्द्र॒ प्रतू॑र्तिष्व॒भि विश्वा॑ असि॒ स्पृधः॑ ।\nअ॒शस्ति॒हा ज॑नि॒ता वि॑श्व॒तूर॑सि॒ त्वं तू॑र्य तरुष्य॒तः ॥१॥\nअनु॑ ते॒ शुष्मं॑ तु॒रय॑न्तमीयतुः क्षो॒णी शिशुं॒ न मा॒तरा॑ ।\nविश्वा॑स्ते॒ स्पृधः॑ श्नथयन्त म॒न्यवे॑ वृत्रं यदि॑न्द्र॒ तूर्व॑सि ॥२॥\nइ॒त ऊ॒ती वो॑ अ॒जरं॑ प्रहे॒तार॒मप्र॑हितम्।\nआ॒शुं जेता॑रं॒ हेता॑रं रथीत॑म॒मतू॑र्तं तुग्र्या॒वृध॑म्॥३॥\nयो राजा॑ चर्षणी॒नां याता॒ रथे॑भि॒रध्रि॑गुः ।\nविश्वा॑सां तरु॒ता पृत॑नानां॒ ज्येष्ठो॒ यो वृ॑त्र॒हा गृ॒णे॥४॥\nइन्द्रं॒ तं शु॑म्भ पुरुहन्म॒न्नव॑से॒ यस्य॑ द्वि॒ता वि॑ध॒र्तरि॑ ।\nहस्ता॑य॒ वज्रः॒ प्रति॑ धायि दर्श॒तो म॒हो दि॒वे न सूर्यः॑ ॥५॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 106,
"text": "तव॒ त्यदि॑न्द्रि॒यं बृ॒हत् तव॒ शुष्म॑मु॒त क्रतु॑म्। वज्रं॑ शिशाति धि॒षणा॒ वरे॑ण्यम्॥१॥\nतव॒ द्यौरि॑न्द्र॒ पौंस्यं॑ पृथि॒वी व॑र्धति॒ श्रवः॑ । त्वामापः॒ पर्व॑तासश्च हिन्विरे ॥२॥\nत्वां विष्णु॑र्बृ॒हन् क्षयो॑ मि॒त्रो गृ॑णाति॒ वरु॑णः । त्वां शर्धो॑ मद॒त्यनु॒ मारु॑तम्॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 107,
"text": "सम॑स्य म॒न्यवे॒ विशो॒ विश्वा॑ नमन्त कु॒ष्टयः॑ । स॒मु॒द्राये॑व॒ सिन्ध॑वः ॥१॥\nओज॒स्तद॑स्य तित्विष उ॒भे यत् स॒मव॑र्तयत्। इन्द्र॒श्चर्मे॑व॒ रोद॑सी ॥२॥\nवि चिद् वृ॒त्रस्य॒ दोध॑तो॒ वज्रे॑ण श॒तप॑र्वणा । शिरो॑ बिभेद् वृ॒ष्णिना॑ ॥३॥\nतदिदा॑स॒ भुव॑नेषु॒ ज्येष्ठं॒ यतो॑ ज॒ज्ञ उ॒ग्रस्त्वे॒षनृ॑म्णः ।\nस॒द्यो ज॑ज्ञा॒नो नि रि॑णाति॒ शत्रू॒ननु॒ यदे॑नं॒ मद॑न्ति॒ विश्व॒ ऊमाः॑ ॥४॥\nवा॒वृ॒धा॒नः शव॑सा॒ भूर्यो॑जाः॒ शत्रु॑र्दा॒साय॑ भि॒यसं॑ दधाति ।\nअव्य॑नच्च व्य॒नच्च॒ सस्नि॒ सं ते॑ नवन्त॒ प्रभृ॑ता॒ मदे॑षु ॥५॥\nत्वे क्रतु॒मपि॑ पृञ्चन्ति॒ भूरि॒ द्विर्यदे॒ते त्रिर्भव॒न्त्यूमाः॑ ।\nस्वा॒दोः स्वादी॑यः स्वा॒दुना॑ सृजा॒ सम॒दः सु मधु॒ मधु॑ना॒भि यो॑धीः ॥६॥\nयदि॑ चि॒न्नु त्वा॒ धना॒ जय॑न्तं॒ रणे॑रणे अनु॒मद॑न्ति॒ विप्राः॑ ।\nओजी॑यः शुष्मिन्त्स्थि॒रमा त॑नुष्व॒ मा त्वा॑ दभन् दु॒रेवा॑सः क॒शोकाः॑ ॥७॥\nत्वया॑ व॒यं शा॑शद्महे॒ रणे॑षु प्र॒पश्य॑न्तो यु॒धेन्या॑नि॒ भूरि॑ ।\nचो॒दया॑मि त॒ आयु॑धा॒ वचो॑भिः॒ सं ते॑ शिशामि॒ ब्रह्म॑णा॒ वयां॑सि ॥८॥\nनितद् द॑धि॒षेऽव॑रे॒ परे॑ च॒ यस्मि॒न्नावि॒थाव॑सा दुरो॒णे।\nआ स्था॑पयत मा॒तरं॑ जिग॒त्नुमत॑ इन्वत॒ कर्व॑राणि॒ भूरि॑ ॥९॥\nस्तु॒ष्व व॑र्ष्मन् पुरु॒वर्त्मा॑नं॒ समृभ्वा॑णमि॒नत॑ममा॒प्तमा॒प्त्याना॑म्।\nआ द॑र्शति॒ शव॑सा॒ भूर्यो॑जाः॒ प्र स॑क्षति प्रति॒मानं॑ पृथि॒व्याः ॥१०॥\nइ॒मा ब्रह्म॑ बृ॒हद्दि॑वः कृणव॒दिन्द्रा॑य शू॒षम॑ग्नि॒यः स्व॒र्षाः ।\nम॒हो गो॒त्रस्य॑ क्षयति स्व॒राजा॒ तुर॑श्चि॒द् विश्व॑मर्णव॒त् तप॑स्वान्॥११॥\nए॒वा म॒हान् बृ॒हद्दि॑वो॒ अथ॒र्वावो॑च॒त् स्वां त॒न्व॑१मिन्द्र॑मे॒व।\nस्वसा॑रौ मात॒रिभ्व॑री अरि॒प्रे हि॒न्वन्ति॑ चैने॒ शव॑सा व॒र्धय॑न्ति च ॥१२॥\nचि॒त्रं दे॒वानां॑ के॒तुरनी॑कं॒ ज्योति॑ष्मान् प्र॒दिशः॒ सूर्य॑ उ॒द्यन्।\nदि॒वा॒क॒रोऽति॑ द्यु॒म्नैस्तमां॑सि॒ विश्वा॑तारीद् दुरि॒तानि॑ शु॒क्रः ॥१३॥\nचि॒त्रं दे॒वाना॒मुद॑गा॒दनी॑कं॒ चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्या॒ग्नेः ।\nआप्रा॒द् द्यावा॑पृथि॒वी अ॒न्तरि॑क्षं॒ सूर्य॑ आ॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च ॥१४॥\nसूर्यो॑ दे॒वीमु॒षसं॒ रोच॑मानां॒ मर्यो॒ न योषा॑म॒भ्येति प॒श्चात्।\nयत्रा॒ नरो॑ देव॒यन्तो॑ यु॒गानि॑ वितन्व॒ते प्रति॑ भ॒द्राय॑ भ॒द्रम्॥१५॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 108,
"text": "त्वं न॑ इ॒न्द्रा भ॑रं॒ ओजो॑ नृ॒म्णं श॑तक्रतो विचर्षणे । आ वी॒रं पृ॑तना॒षह॑म्॥१॥\nत्वं हि नः॑ पि॒ता व॑सो॒ त्वं मा॒ता श॑तक्रतो ब॒भूवि॑थ । अधा॑ ते सु॒म्नमी॑महे ॥२॥\nत्वां शु॑ष्मिन् पुरुहूत वाज॒यन्त॒मुप॑ ब्रुवे शतक्रतो । स नो॑ रास्व सु॒वीर्य॑म्॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 109,
"text": "स्वा॒दोरि॒त्था वि॑षू॒वतो॒ मध्वः॑ पिबन्ति गौ॒र्यः ।\nया इन्द्रे॑ण स॒याव॑री॒र्वृष्णा॒ मद॑न्ति शो॒भसे॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म्॥१॥\nता अ॑स्य पृशना॒युवः॒ सोमं॑ श्रीणन्ति॒ पृश्न॑यः ।\nप्रि॒या इन्द्र॑स्य धे॒नवो॒ वज्रं॑ हिन्वन्ति॒ साय॑कं॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म्॥२॥\nता अ॑स्य॒ नम॑सा॒ सहः॑ सप॒र्यन्ति॒ प्रचे॑तसः ।\nव्र॒तान्य॑स्य सश्चिरे पु॒रूणि॑ पू॒र्वचि॑त्तये॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म्॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 110,
"text": "इन्द्रा॑य॒ मद्व॑ने सु॒तं परि॑ ष्टोभन्तु नो॒ गिरः॑ । अ॒र्कम॑र्चन्तु का॒रवः॑ ॥१॥\nयस्मि॒न् विश्वा॒ अधि॒ श्रियो॒ रण॑न्ति स॒प्त सं॒सदः॑ । इन्द्रं॑ सु॒ते ह॑वामहे ॥२॥\nत्रिक॑द्रुकेषु॒ चेत॑नं दे॒वासो॑ य॒ज्ञम॑त्नत । तमिद् व॑र्धन्तु नो॒ गिरः॑ ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 111,
"text": "यत् सो॑ममिन्द्र॒ विष्ण॑वि॒ यद् वा॑ घ त्रि॒त आ॒प्त्ये। यद् वा॑ म॒रुत्सु॒ मन्द॑से॒ समिन्दु॑भिः ॥१॥\nयद् वा॑ शक्र परा॒वति॑ समु॒द्रे अधि॒ मन्द॑से । अ॒स्माक॒मित् सु॒ते र॑णा॒ समिन्दु॑भिः ॥२॥\nयद् वासि॑ सुन्व॒तो वृ॒धो यज॑मानस्य सत्पते । उ॒क्थे वा॒ यस्य॒ रण्य॑सि॒ समिन्दु॑भिः ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 112,
"text": "यद॒द्य कच्च॑ वृत्रहन्नु॒दगा॑ अ॒भि सू॑र्य । सर्वं॒ तदि॑न्द्र ते॒ वशे॑ ॥१॥\nयद् वा॑ प्रवृद्ध सत्पते॒ न म॑रा॒ इति॒ मन्य॑से । उ॒तो तत् स॒त्यमित् तव॑ ॥२॥\nये सोमा॑सः परा॒वति॒ ये अ॑र्वा॒वति॑ सुन्वि॒रे। सर्वां॒स्तां इ॑न्द्र गच्छसि ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 113,
"text": "उ॒भयं॑ शृ॒णव॑च्च न॒ इन्द्रो॑ अ॒र्वागि॒दं वचः॑ ।\nस॒त्राच्या॑ म॒घवा॒ सोम॑पीतये धि॒या शवि॑ष्ठ॒ आ ग॑मत्॥१॥\nतं हि स्व॒राजं॑ वृष॒भं तमोज॑से धि॒षणे॑ निष्टत॒क्षतुः॑ ।\nउ॒तोप॒मानां॑ प्रथ॒मो नि षी॑दसि॒ सोम॑कामं॒ हि ते॒ मनः॑ ॥२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 114,
"text": "अ॒भ्रा॒तृ॒व्यो अ॒ना त्वमना॑पिरिन्द्र ज॒नुषा॑ स॒नाद॑सि । यु॒धेदा॑पि॒त्वमि॑च्छसे ॥१॥\nनकी॑ रे॒वन्तं॑ स॒ख्याय॑ विन्दसे॒ पीय॑न्ति ते सुरा॒श्वः ।\nय॒दा कृ॒णोषि॑ नद॒नुं समू॑ह॒स्यादित् पि॒तेव॑ हूयसे ॥२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 115,
"text": "अ॒हमिद्धि पि॒तुष्परि॑ मे॒धामृ॒तस्य॑ ज॒ग्रभ॑ । अ॒हं सूर्य॑ इवाजनि ॥१॥\nअ॒हं प्र॒त्नेन॒ मन्म॑ना॒ गिरः॑ शुम्भामि कण्व॒वत्। येनेन्द्रः॒ शुष्म॒मिद् द॒धे॥२॥\nये त्वामि॑न्द्र॒ न तु॑ष्टु॒वुर्ऋष॑यो॒ ये च॑ तुष्टु॒वुः । ममेद् व॑र्धस्व॒ सुष्टु॑तः ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 116,
"text": "मा भू॑म॒ निष्ट्या॑ इ॒वेन्द्र॒ त्वदर॑णा इव ।\nवना॑नि॒ न प्र॑जहि॒तान्य॑द्रिवो दु॒रोषा॑सो अमन्महि ॥१॥\nअम॑न्म॒हीद॑ना॒शवो॑ऽनु॒ग्रास॑श्च वृत्रहन्।\nसु॒कृत्सु ते॑ मह॒ता शू॑र॒ राध॒सानु॒ स्तोमं॑ मुदीमहि ॥२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 117,
"text": "पिबा॒ सोम॑मिन्द्र॒ मन्द॑तु त्वा॒ यं ते॑ सु॒षाव॑ हर्य॒श्वाद्रिः॑ ।\nसो॒तुर्बा॒हुभ्यां॒ सुय॑तो॒ नार्वा॑ ॥१॥\nयस्ते॒ मदो॒ युज्य॒श्चारु॒रस्ति॒ येन॑ वृ॒त्राणि॑ हर्यश्व॒ हंसि॑ ।\nस त्वामि॑न्द्र प्रभूवसो ममत्तु ॥२॥\nबोधा॑ सु मे॑ मघव॒न् वाच॒मेमां यां ते॒ वसि॑ष्ठो॒ अर्च॑ति॒ प्रश॑स्तिम्।\nइ॒मा ब्रह्म॑ सध॒मादे॑ जुषस्व ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 118,
"text": "श॒ग्ध्यू॒३षु श॑चीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑ ।\nभगं॒ न हि त्वा॑ य॒शसं॑ वसु॒विद॒मनु॑ शूर॒ चरा॑मसि ॥१॥\nपौ॒रो अश्व॑स्य पुरु॒कृद् गवा॑म॒स्युत्सो॑ देव हिर॒ण्ययः॑ ।\nनकि॒र्हि दानं॑ परि॒मर्धि॑ष॒त् त्वे यद्य॒द्यामि॒ तदा भ॑र ॥२॥\nइन्द्र॒मिद् दे॒वता॑तय॒ इन्द्रं॑ प्रय॒त्यऽध्व॒रे।\nइन्द्रं॑ समी॒के व॒निनो॑ हवामह॒ इन्द्रं॒ धन॑स्य सा॒तये॑ ॥३॥\nइन्द्रो॑ म॒ह्ना रोद॑सी पप्रथ॒च्छव॒ इन्द्रः॒ सूर्य॑मरोचयत्।\nइन्द्रे॑ ह॒ विश्वा॒ भुव॑नानि येमिर॒ इन्द्रे॑ सुवा॒नास॒ इन्द॑वः ॥४॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 119,
"text": "अस्ता॑वि॒ मन्म॑ पू॒र्व्यं ब्रह्मेन्द्रा॑य वोचत ।\nपू॒र्वीरृ॒तस्य॑ बृह॒तीर॑नूषत स्तो॒तुर्मे॒घा अ॑सृक्षत ॥१॥\nतु॒र॒ण्यवो॒ मधु॑मन्तं घृत॒श्चुतं॒ विप्रा॑सो अ॒र्कमा॑नृचुः ।\nअ॒स्मे र॒यिः प॑प्रथे॒ वृष्ण्यं॒ शवो॒ऽस्मे सु॑वा॒नास॒ इन्द॑वः ॥२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 120,
"text": "यदि॑न्द्र॒ प्रागपा॒गुद॒ङ्न्यग् वा हू॒यसे॒ नृभिः॑ ।\nसिमा॑ पु॒रू नृषू॑तो अ॒स्यान॒वेऽसि॑ प्रशर्ध तु॒र्वशे॑ ॥१॥\nयद् वा॒ रुमे॒ रुश॑मे॒ श्याव॑के॒ कृप॒ इन्द्र॑ मा॒दय॑से॒ सचा॑ ।\nकण्वा॑सस्त्वा॒ ब्रह्म॑भि॒ स्तोम॑वाहस॒ इन्द्रा य॑च्छ॒न्त्या ग॑हि ॥२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 121,
"text": "अ॒भि त्वा॑ शूर नोनु॒मोऽदु॑ग्धा इव धे॒नवः॑ ।\nईशा॑नम॒स्य जग॑तः स्व॒र्दृश॒मीशा॑नमिन्द्र त॒स्थुषः॑ ॥१॥\nन त्वावां॑ अ॒न्यो दि॒व्यो न पार्थि॑वो॒ न जा॒तो न ज॑निष्यते ।\nअ॒श्वा॒यन्तो॑ मघवन्निन्द्र वा॒जिनो॑ ग॒व्यन्त॑स्त्वा हवामहे ॥२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 122,
"text": "रे॒वती॑र्नः सध॒माद॒ इन्द्रे॑ सन्तु तु॒विवा॑जाः । क्षु॒मन्तो॒ याभि॒र्मदे॑म ॥१॥\nआ घ त्वावा॒न् त्मना॒प्त स्तो॒तृभ्यो॑ धृष्णविया॒नः । ऋ॒णोरक्षं॒ न च॒क्र्योः ॥२॥\nआ यद् दुवः॑ शतक्रत॒वा कामं॑ जरितॄ॒णाम्। ऋ॒णोरक्षं॒ न शची॑भिः ॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 123,
"text": "तत् सूर्य॑स्य देव॒त्वं तन्म॑हि॒त्वं म॒ध्या कर्तो॒र्वित॑तं॒ सं ज॑भार ।\nय॒देदयु॑क्त ह॒रितः॑ स॒धस्था॒दाद् रात्री॒ वास॑स्तनुते सि॒मस्मै॑ ॥१॥\nतन्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्याभि॒चक्षे॒ सूर्यो॑ रू॒पं कृ॑णुते॒ द्योरु॒पस्थे॑ ।\nअ॒न॒न्तम॒न्यद् रुश॑दस्य॒ पाजः॑ कृ॒ष्णम॒न्यद्ध॒रितः॒ सं भ॑रन्ति ॥२॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 124,
"text": "कया॑ नश्चि॒त्र आ भु॑वदू॒ती स॒दावृ॑धः॒ सखा॑ । कया॒ शचि॑ष्ठया वृ॒ता॥१॥\nकस्त्वा॑ स॒त्यो मदा॑नां॒ मंहि॑ष्ठो मत्स॒दन्ध॑सः । दृ॒ल्हा चि॑दा॒रुजे॒ वसु॑ ॥२॥\nअ॒भी षु णः॒ सखी॑नामवि॒ता ज॑रितॄ॒णाम्। श॒तं भ॑वास्यू॒तिभिः॑ ॥३॥\nइ॒मा नु कं॒ भुव॑ना सीषधा॒मेन्द्र॑श्च॒ विश्वे॑ च दे॒वाः ।\nय॒ज्ञं च॑ नस्त॒न्वं च प्र॒जां चा॑दि॒त्यैरिन्द्रः॑ स॒ह ची॑क्लृपाति ॥४॥\nआ॒दि॒त्यैरिन्द्रः॒ सग॑णो म॒रुद्भि॑र॒स्माकं॑ भूत्ववि॒ता त॒नूना॑म्।\nह॒त्वाय॑ दे॒वा असु॑रान् यदाय॑न् दे॒वा दे॑व॒त्वम॑भि॒रक्ष॑माणाः ॥५॥\nप्र॒त्यञ्च॑म॒र्कम॑नयं॒ छची॑भि॒रादित् स्व॒धामि॑षि॒रां पर्य॑पश्यन्।\nअ॒या वाजं॑ दे॒वहि॑तं सनेम॒ मदे॑म श॒तहि॑माः सु॒वीराः॑ ॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 125,
"text": "अपे॑न्द्र॒ प्रा॑चो मघवन्न॒मित्रा॒नपापा॑चो अभिभूते नुदस्व ।\nअपोदी॑चो॒ अप॑ शूराध॒राच॑ उ॒रौ यथा॒ तव॒ शर्म॒न् मदे॑म ॥१॥\nकु॒विद॒ङ्ग यव॑मन्तो॒ यवं॑ चि॒द् यथा॒ दान्त्य॑नुपू॒र्वं वि॒यूय॑ ।\nइ॒हेहै॑षां कृणुहि॒ भोज॑नानि॒ ये ब॒र्हिषो॒ नमो॑वृक्तिं॒ न ज॒ग्मुः ॥२॥\nन॒हि स्थूर्यृ॑तु॒था या॒तमस्ति॒ नोत श्रवो॑ विविदे संग॒मेषु॑ ।\nग॒व्यन्त॒ इन्द्रं॑ स॒ख्याय॒ विप्रा॑ अश्वा॒यन्तो॒ वृष॑णं वा॒जय॑न्तः ॥३॥\nयु॒वं सु॒राम॑मश्विना॒ नमु॑चावासु॒रे सचा॑ ।\nवि॒पि॒पा॒ना शु॑भस्पती॒ इन्द्रं॒ कर्म॑स्वावतम्॥४॥\nपु॒त्रमि॑व पि॒तरा॑व॒श्विनो॒भेन्द्रा॒वथुः॒ काव्यै॑र्दं॒सना॑भिः ।\nयत् सु॒रामं॒ व्यपि॑बः॒ शची॑भिः॒ सर॑स्वती त्वा मघवन्नभिष्णक्॥५॥\nइन्द्रः॑ सु॒त्रामा॒ स्ववाँ॒ अवो॑भिः सुमृडी॒को भ॑वतु वि॒श्ववे॑दाः ।\nबाध॑तां॒ द्वेषो॒ अभ॑यं नः कृणोतु सु॒वीर्य॑स्य॒ पत॑यः स्याम ॥६॥\nस सु॒त्रामा॒ स्ववाँ॒ इन्द्रो॑ अ॒स्मदा॒राच्चि॒द् द्वेषः॑ सनु॒तर्यु॑योतु ।\nतस्य॑ व॒यं सु॑म॒तौ य॒ज्ञिय॒स्यापि॑ भ॒द्रे सौ॑मन॒से स्या॑म ॥७॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 126,
"text": "वि हि सोतो॒रसृ॑क्षत॒ नेन्द्रं॑ दे॒वम॑मंसत ।\nयत्राम॑दद् वृ॒षाक॑पिर॒र्यः पु॒ष्टेषु॒ मत्स॑खा॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥१॥\nपरा॒ ही॑न्द्र॒ धाव॑सि वृ॒षाक॑पे॒रति॒ व्यथिः॑ ।\nनो अह॒ प्र वि॑न्दस्य॒न्यत्र॒ सोम॑पीतये॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥२॥\nकिम॒यं त्वां वृ॒षाक॑पिश्च॒कार॒ हरि॑तो मृ॒गः ।\nयस्मा॑ इर॒स्यसीदु॒ न्व॑१र्यो वा॑ पुष्टि॒मद् वसु॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥३॥\nयमि॒मं त्वं वृ॒षाक॑पिं प्रि॒यमि॑न्द्राभि॒रक्ष॑सि ।\nश्वा न्व॑स्य जम्भिष॒दपि॒ कर्णे॑ वराह॒युर्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥४॥\nप्रि॒या त॒ष्टानि॑ मे क॒पिर्व्य॑क्ता॒ व्यऽदूदुषत्।\nशिरो॒ न्वऽस्य राविषं॒ न सु॒गं दु॒ष्कृते॑ भुवं॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥५॥\nन मत् स्त्री सु॑भ॒सत्त॑रा॒ न सु॒याशु॑तरा भुवत्।\nन मत् प्रति॑च्यवीयसी॒ न सक्थ्युद्य॑मीयसी॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥६॥\nउ॒वे अ॑म्ब सुलाभिके॒ यथे॑वा॒ङ्गं भ॑वि॒ष्यति॑ ।\nभ॒सन्मे॑ अम्ब॒ सक्थि॑ मे॒ शिरो॑ मे॒ वीऽव हृष्यति॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥७॥\nकिं सु॑बाहो स्वङ्गुरे॒ पृथु॑ष्टो॒ पृथु॑जाघने ।\nकिं शू॑रपत्नि न॒स्त्वम॒भ्यऽमीषि वृ॒षाक॑पिं॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥८॥\nअ॒वीरा॑मिव॒ माम॒यं श॒रारु॑र॒भि म॑न्यते ।\nउ॒ताहम॑स्मि वी॒रिणीन्द्र॑पत्नी म॒रुत्स॑खा॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥९॥\nसं॒हो॒त्रं स्म॑ पु॒रा नारी॒ सम॑नं॒ वाव॑ गच्छति ।\nवे॒धा ऋ॒तस्य॑ वी॒रिणीन्द्र॑पत्नी महीयते॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥१०॥\nइ॒न्द्रा॒णीमा॒सु नारि॑षु सु॒भगा॑म॒हम॑श्रवम्।\nन॒ह्यऽस्या अप॒रं च॒न ज॒रसा॒ मर॑ते॒ पति॒र्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥११॥\nनाहमि॑न्द्राणि रारण॒ सख्यु॑र्वृ॒षाक॑पेरृ॒ते।\nयस्ये॒दमप्यं॑ ह॒विः प्रि॒यं दे॒वेषु॒ गच्छ॑ति॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥१२॥\nवृषा॑कपायि॒ रेव॑ति॒ सुपु॑त्र॒ आदु॒ सुस्नु॑षे ।\nघस॑च॒ इन्द्र॑ उ॒क्षणः॑ प्रि॒यं का॑चित्क॒रं ह॒विर्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥१३॥\nउ॒क्ष्णो हि मे॒ पञ्च॑दश सा॒कं पच॑न्ति विंश॒तिम्।\nउ॒ताहम॑द्मि॒ पीव॒ इदु॒भा कु॒क्षी पृ॑णन्ति मे॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥१४॥\nवृ॒ष॒भो न ति॒ग्मशृ॑ङ्गो॒ऽन्तर्यू॒थेषु॒ रोरु॑वत्।\nम॒न्थस्त॑ इन्द्र॒ शं हृ॒दे यं ते॑ सु॒नोति॑ भाव॒युर्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥१५॥\nन सेशे॒ यस्य॒ रम्ब॑तेऽन्त॒रा स॒क्थ्या॒३ कपृ॑त्।\nसेदी॑शे॒ यस्य॒ रोम॒शं नि॑षे॒दुषो॑ वि॒जृम्भ॑ते॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥१६॥\nन सेशे॒ यस्य॑ रोम॒शं नि॑षे॒दुषो॑ वि॒जृम्भ॑ते ।\nसेदी॑शे॒ यस्य॒ रम्ब॑तेऽन्त॒रा स॒क्थ्या॒३ कपृ॑द् विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥१७॥\nअ॒यमि॑न्द्र वृ॒षाक॑पिः॒ पर॑स्वन्तं ह॒तं वि॑दत्।\nअ॒सिं सू॒नां नवं॑ च॒रुमादेध॒स्यान॒ आचि॑तं॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥१८॥\nअ॒यमे॑मि वि॒चाक॑शद् विचि॒न्वन् दास॒मार्य॑म्।\nपिबा॑मि पाक॒सुत्व॑नो॒ऽभि धीर॑मचाकशं॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥१९॥\nधन्व॑ च॒ यत् कृ॒न्तत्रं॑ च॒ कति॑ स्वि॒त् ता वि योज॑ना ।\nनेदी॑यसो वृषाक॒पेऽस्त॒मेहि॑ गृ॒हाँ उप॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥२०॥\nपुन॒रेहि॑ वृषाकपे सुवि॒ता क॑ल्पयावहै ।\nय ए॒ष स्व॑प्न॒नंश॒नोऽस्त॒मेषि॑ प॒था पुन॒र्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥२१॥\nयदुद॑ञ्चो वृषाकपे गृ॒हमि॒न्द्राज॑गन्तन ।\nक्व॑१स्य पु॑ल्व॒घो मृ॒गः कम॑गं जन॒योप॑नो॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥२२॥\nपर्शु॑र्ह॒ नाम॑ मान॒वी सा॒कं स॑सूव विंश॒तिम्।\nभ॒द्रं भ॑ल॒ त्यस्या॑ अभू॒द् यस्या॑ उ॒दर॒माम॑य॒द् विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥२३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 127,
"text": "॥ अथ कुन्तापसूक्तानि ॥\nखिलानि ।\nइ॒दं जना॒ उप॑ श्रुत॒ नरा॒शंस॒ स्तवि॑ष्यते ।\nष॒ष्टिं स॒हस्रा॑ नव॒तिं च॑ कौरम॒ आ रु॒शमे॑षु दद्महे ॥१॥\nउष्ट्रा॒ यस्य॑ प्रवा॒हणो॑ व॒धूम॑न्तो द्वि॒र्दश॑ ।\nव॒र्ष्मा रथ॑स्य॒ नि जि॑हीडते दि॒व ई॒षमा॑णा उप॒स्पृशः॑ ॥२॥\nए॒ष इ॒षाय॑ मामहे श॒तं नि॒ष्कान् दश॒ स्रजः॑ ।\nत्रीणि॑ श॒तान्यर्व॑तां स॒हस्रा॒ दश॒ गोना॑म्॥३॥\nवच्य॑स्व रेभ॑ वच्यस्व वृ॒क्षे न प॒क्वे श॒कुनः॑ ।\nनष्टे॑ जि॒ह्वा च॑र्चरीति क्षु॒रो न भु॒रिजो॑रिव ॥४॥\nप्र रे॒भासो॑ मनी॒षा वृषा॒ गाव॑ इवेरते ।\nअ॒मो॒त॒पुत्र॑का ए॒षाम॒मोत॑ गा॒ इवा॑सते ॥५॥\nप्र रे॑भ॒ धीं भ॑रस्व गो॒विदं॑ वसु॒विद॑म्।\nदे॒व॒त्रेमां वाचं॑ स्रीणी॒हीषु॒र्नावी॑र॒स्तार॑म्॥६॥\nराज्ञो॑ विश्व॒जनी॑नस्य॒ यो दे॒वोऽमर्त्यां॒ अति॑ ।\nवै॒श्वा॒न॒रस्य॒ सुष्टु॑ति॒मा सु॒नोता॑ परि॒क्षितः॑ ॥७॥\nप॒रि॒च्छिन्नः॒ क्षेम॑मकरो॒त् तम॒ आस॑नमा॒चर॑न्।\nकुला॑यन् कृ॒ण्वन् कौर॑व्यः॒ पति॒र्वद॑ति जा॒यया॑ ॥८॥\nक॒त॒रत् त॒ आ ह॑राणि॒ दधि॒ मन्थां॑ परि॒ श्रुत॑म्।\nजा॒याः पतिं॒ वि पृ॑च्छति रा॒ष्ट्रे राज्ञः॑ परि॒क्षितः॑ ॥९॥\nअ॒भीवस्वः॒ प्र जि॑हीते॒ यवः॑ प॒क्वः प॒थो बिल॑म्।\nजनः॒ स भ॒द्रमेध॑ति रा॒ष्ट्रे राज्ञः॑ परि॒क्षितः॑ ॥१०॥\nइन्द्रः॑ का॒रुम॑बूबुध॒दुत्ति॑ष्ठ॒ वि च॑रा॒ जन॑म्।\nममेदु॒ग्रस्य॒ चर्कृ॑धि॒ सर्व॒ इत् ते॑ पृणाद॒रिः ॥११॥\nइ॒ह गावः॒ प्रजा॑यध्वमि॒हाश्वा इ॒ह पूरु॑षाः ।\nइ॒हो स॒हस्र॑दक्षि॒णोऽपि॑ पू॒षा नि षी॑दति ॥१२॥\nनेमा इ॑न्द्र॒ गावो॑ रिष॒न् मो आ॒सां गोप॑ रीरिषत्।\nमासा॑म॒मित्र॒युर्जन॒ इन्द्र॒ मा स्ते॒न ई॑शत ॥१३॥\nउप॑ नो न रमसि॒ सूक्ते॑न॒ वच॑सा व॒यं भ॒द्रेण॒ वच॑सा व॒यम्।\nवना॑दधिध्व॒नो गि॒रो न रि॑ष्येम क॒दा च॒न॥१४॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 128,
"text": "खिलानि ।\nयः स॒भेयो॑ विद॒थ्यः सु॒त्वा य॒ज्वाथ॒ पूरु॑षः ।\nसूर्यं॒ चामू॑ रि॒शादस॒स्तद् दे॒वाः प्राग॑कल्पयन्॥१॥\nयो जा॒म्या अप्र॑थय॒स्तद् यत् सखा॑यं॒ दुधू॑र्षति ।\nज्येष्ठो॒ यद॑प्रचेता॒स्तदा॑हु॒रध॑रा॒गिति॑ ॥२॥\nयद् भ॒द्रस्य॒ पुरु॑षस्य पु॒त्रो भ॑वति दाधृ॒षिः ।\nतद् वि॒प्रो अब्र॑वीदु॒ तद् ग॑न्ध॒र्वः काम्यं॒ वचः॑ ॥३॥\nयश्च॑ प॒णि रघु॑जि॒ष्ठ्यो यश्च॑ दे॒वां अदा॑शुरिः ।\nधीरा॑णां॒ शश्व॑ताम॒हं तद॑पा॒गिति॑ शुश्रुम ॥४॥\nये च॑ दे॒वा अय॑ज॒न्ताथो॒ ये च॑ पराद॒दिः ।\nसूर्यो॒ दिव॑मिव ग॒त्वाय॑ म॒घवा॑ नो॒ वि र॑प्शते ॥५॥\nयोना॒क्ताक्षो॑ अनभ्य॒क्तो अम॑णि॒वो अहि॑र॒ण्यवः॑ ।\nअब्र॑ह्मा॒ ब्रह्म॑णः पु॒त्रस्तो॒ता कल्पे॑षु सं॒मिता॑ ॥६॥\nय आ॒क्ताक्षः॑ सुभ्य॒क्तः सुम॑णिः॒ सुहि॑र॒ण्यवः॑ ।\nसुब्र॑ह्मा॒ ब्रह्म॑णः पु॒त्रस्तो॒ता कल्पे॑षु सं॒मिता॑ ॥७॥\nअप्र॑पा॒णा च॑ वेश॒न्ता रे॒वां अप्रति॑दिश्ययः ।\nअय॑भ्या क॒न्या कल्या॒णी तो॒ता कल्पे॑षु सं॒मिता॑ ॥८॥\nसुप्र॑पा॒णा च॑ वेश॒न्ता रे॒वान्त्सुप्रति॑दिश्ययः ।\nसुय॑भ्या क॒न्या कल्या॒णी तो॒ता कल्पे॑षु सं॒मिता॑ ॥९॥\nपरि॑वृ॒क्ता च॒ महि॑षी स्व॒स्त्या च यु॒धिंग॒मः ।\nअना॑शुर॑श्चाया॒मी तो॒ता कल्पे॑षु सं॒मिता॑ ॥१०॥\nवा॒वा॒ता च॒ महि॑षी स्व॒स्त्या च यु॒धिंग॒मः ।\nश्वा॒शुर॑श्चाया॒मी तो॒ता कल्पे॑षु सं॒मिता॑ ॥११॥\nयदि॑न्द्रा॒दो दा॑शरा॒ज्ञे मानु॑षं॒ वि गा॑हथाः ।\nविरू॑पः॒ सर्व॑स्मा आसीत् सह य॒क्षाय॒ कल्प॑ते ॥१२॥\nत्वं वृ॑षा॒क्षुं म॑घव॒न्नम्रं॑ म॒र्याकरो॒ रविः॑ ।\nत्वं रौ॑हि॒णं व्यास्यो॒ वि वृ॒त्रस्याभि॑न॒च्छिरः॑ ॥१३॥\nयः पर्व॑ता॒न् व्य॑दधा॒द् यो अ॒पो व्य॑गाहथाः ।\nइन्द्रो॒ यो वृ॑त्र॒हान्म॒हं तस्मा॑दिन्द्र॒ नमो॑ऽस्तु ते ॥१४॥\nपृ॒ष्ठं धाव॑न्तं ह॒र्योरौच्चैः॑ श्रव॒सम॑ब्रुवन्।\nस्व॒स्त्यश्व॒ जैत्रा॒येन्द्र॒मा व॑ह सु॒स्र॑म्॥१५॥\nये त्वा॑ श्वे॒ता अजै॑श्रव॒सो हार्यो॑ युञ्जन्ति॒ दक्षि॑णम्।\nपूर्वा॒ नम॑स्य दे॒वानां॒ बिभ्र॑दिन्द्र महीयते ॥१६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 129,
"text": "खिलानि ।\nए॒ता अश्वा॒ आ प्ल॑वन्ते ॥१॥\nप्र॒ती॒पं प्राति॑ सु॒त्वन॑म्॥२॥\nतासा॒मेका॒ हरि॑क्निका ॥३॥\nहरि॑क्नि॒के किमि॑च्छासि ॥४॥\nसा॒धुं पु॒त्रं हि॑र॒ण्यय॑म्॥५॥\nक्वाह॑तं॒ परा॑स्यः ॥६॥\nयत्रा॒मूस्तिस्रः॑ शिंश॒पाः ॥७॥\nपरि॑ त्रयः ॥८॥\nपृदा॑कवः ॥९॥\nशृङ्गं॑ ध॒मन्त॑ आसते ॥१०॥\nअ॒यन्म॒हा ते॑ अर्वा॒हः ॥११॥\nस इच्छकं॒ सघा॑घते ॥१२॥\nसघा॑घते॒ गोमी॒द्या गोग॑ती॒रिति ॥१३॥\nपुमां॑ कु॒स्ते निमि॑च्छसि ॥१४॥\nपल्प॑ बद्ध॒ वयो॒ इति॑ ॥१५॥\nबद्ध॑ वो॒ अघा॒ इति॑ ॥१६॥\nअजा॑गार॒ केवि॒का॥१७॥\nअश्व॑स्य॒ वारो॑ गोशपद्य॒के॥१८॥\nश्येनी॒पती॑ सा॥१९॥\nअ॒ना॒म॒योप॑जि॒ह्विका॑ ॥२०॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 130,
"text": "खिलानि ।\nको अ॑र्य बहु॒लिमा॒ इषू॑नि ॥१॥\nको असि॒द्याः पयः॑ ॥२॥\nको अर्जु॑न्याः॒ पयः॑ ॥३॥\nकः का॒र्ष्ण्याः पयः॑ ॥४॥\nए॒तं पृ॑च्छ॒ कुहं॑ पृच्छ ॥५॥\nकुहा॑कं पक्व॒कं पृ॑च्छ ॥६॥\nयवा॑नो यति॒ष्वभिः॑ कुभिः ॥७॥\nअकु॑प्यन्तः॒ कुपा॑यकुः ॥८॥\nआम॑णको॒ मण॑त्सकः ॥९॥\nदेव॑ त्वप्रतिसूर्य ॥१०॥\nएन॑श्चिपङ्क्ति॒का ह॒विः ॥११॥\nप्रदुद्रु॑दो॒ मघा॑प्रति ॥१२॥\nशृङ्ग॑ उत्पन्न ॥१३॥\nमा त्वा॑भि॒ सखा॑ नो विदन्॥१४॥\nव॒शायाः॑ पु॒त्रमा य॑न्ति ॥१५॥\nइरा॑वेदु॒मयं॑ दत ॥१६॥\nअथो॑ इ॒यन्निय॒न्निति॑ ॥१७॥\nअथो॑ इ॒यन्निति॑ ॥१८॥\nअथो॒ श्वा अस्थि॑रो भवन्॥१९॥\nउ॒यं य॒कांश॑लोक॒का॥२०॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 131,
"text": "खिलानि ।\nआमि॑नोनि॒ति भ॑द्यते ॥१॥\nतस्य॑ अनु॒ निभ॑ञ्जनम्॥२॥\nवरु॑णो॒ याति॒ वस्व॑भिः ॥३॥\nश॒तं वा॒ भार॑ती॒ शवः॑ ॥४॥\nश॒तमा॒श्वा हि॑र॒ण्ययाः॑ । श॒तं र॒थ्या हि॑र॒ण्ययाः॑ ।\nश॒तं कु॒था हि॑र॒ण्ययाः॑ । श॒तं नि॒ष्का हि॑र॒ण्ययाः॑ ॥५॥\nअह॑ल कुश वर्त्तक ॥६॥\nश॒फेन॑ इ॒व ओ॑हते ॥७॥\nआय॑ व॒नेन॑ती॒ जनी॑ ॥८॥\nवनि॑ष्ठा॒ नाव॑ गृ॒ह्यन्ति॑ ॥९॥\nइ॒दं मह्यं॒ मदू॒रिति॑ ॥१०॥\nते वृ॒क्षाः स॒ह ति॑ष्ठति ॥११॥\nपाक॑ ब॒लिः ॥१२॥\nशक॑ ब॒लिः ॥१३॥\nअश्व॑त्थ॒ खदि॑रो ध॒वः ॥१४॥\nअर॑दुपरम ॥१५॥\nशयो॑ ह॒त इ॑व ॥१६॥\nव्याप॒ पूरु॑षः ॥१७॥\nअदू॑हमि॒त्यां पूष॑कम्॥१८॥\nअत्य॑र्ध॒र्च प॑र॒स्वतः॑ ॥१९॥\nदौव॑ ह॒स्तिनो॑ दृ॒ती॥२०॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 132,
"text": "खिलानि ।\nआदला॑बुक॒मेक॑कम्॥१॥\nअला॑बुकं॒ निखा॑तकम्॥२॥\nक॒र्क॒रि॒को निखा॑तकः ॥३॥\nतद्वात॒ उन्म॑थायति॒ ॥४॥\nकुला॑यं कृणवा॒दिति॑ ॥५॥\nउ॒ग्रं व॑नि॒षदा॑ततम्॥६॥\nन व॑निष॒दना॑ततम्॥७॥\nक ए॑षां॒ कर्क॑री लिखत्॥८॥\nक ए॑षां दु॒न्दुभिं॑ हनत्॥९॥\nयदी॒यं ह॑न॒त्कथं॑ हनत्॥१०॥\nदे॒वी ह॑न॒त्कुह॑नत्॥११॥\nपर्या॑गारं॒ पुनः॑पुनः ॥१२॥\nत्रीण्यु॒ष्ट्रस्य॒ नामा॑नि ॥१३॥\nहि॒र॒ण्य इत्येके॑ अब्रवीत्॥१४॥\nद्वौ वा॑ ये शिशवः ॥१५॥\nनील॑शिखण्ड॒वाह॑नः ॥१६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 133,
"text": "खिलानि ।\nवित॑तौ किरणौ॒ द्वौ तावा॑ पिनष्टि॒ पूरु॑षः ।\nन वै॑ कुमारि॒ तत्तथा॒ यथा॑ कुमारि॒ मन्य॑से ॥१॥\nमा॒तुष्टे कि॑रणौ॒ द्वौ निवृ॑त्तः॒ पुरु॑षानृते ।\nन वै॑ कुमारि॒ तत्तथा॒ यथा॑ कुमारि॒ मन्य॑से ॥२॥\nनिगृ॑ह्य॒ कर्ण॑कौ॒ द्वौ निरा॑यच्छसि॒ मध्य॑मे ।\nन वै॑ कुमारि॒ तत्तथा॒ यथा॑ कुमारि॒ मन्य॑से ॥३॥\nउ॒त्ता॒नायै॒ शया॒नायै॒ तिष्ठ॑न्ती॒ वाव॑ गूहसि ।\nन वै॑ कमारि॒ तत्तथा॒ यथा॑ कुमारि॒ मन्य॑से ॥४॥\nश्लक्ष्णा॑यां॒ श्लक्ष्णि॑कायां॒ श्लक्ष्ण॑मे॒वाव॒ गूहसि ।\nन वै॑ कुमारि॒ तत्तथा॒ यथा॑ कुमारि॒ मन्य॑से ॥५॥\nअव॑श्लक्ष्ण॒मिव॑ भ्रंशद॒न्तर्लोममति॑ ह्र॒दे।\nन वै॑ कुमारि॒ तत्तथा॒ यथा॑ कुमारि॒ मन्य॑से ॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 134,
"text": "खिलानि ।\nइ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धरा॒ग् – अरा॑ला॒गुद॑भर्त्सथ ॥१॥\nइ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धराग् – व॒त्साः पुरु॑षन्त आसते ॥२॥\nइ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धराग् – स्थाली॑पाको॒ वि ली॑यते ॥३॥\nइ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धराग् – स वै॑ पृ॒थु ली॑यते ॥४॥\nइ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धराग् – आष्टे॑ लाहणि॒ लीशा॑थी ॥५॥\nइ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धराग् – अक्ष्लि॑ली॒ पुच्छिली॑यते ॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 135,
"text": "खिलानि ।\nभुगि॑त्य॒भिग॑तः॒ शलि॑त्य॒पक्रा॑न्तः॒ फलि॑त्य॒भिष्ठि॑तः ।\nदु॒न्दुभि॑माहनना॒भ्यां जरितरोथा॑मो दै॒व॥१॥\nको॒श॒बिले॑ रजनि॒ ग्रन्थे॑र्धा॒नमु॒पानहि॑ पा॒दम्।\nउत्त॑मां॒ जनि॑मां ज॒न्यानुत्त॑मां जनी॒न्वर्त्म॑न्यात्॥२॥\nअला॑बूनि पृ॒षात॑का॒न्यश्व॑त्थ॒पला॑शम्।\nपिपी॑लिका॒वट॒श्वसो॑ वि॒द्युत्स्वाप॑र्णश॒फो गोश॒फो जरित॒रोऽथामो॑ दै॒व॥३॥\nवीमे दे॒वा अ॑क्रंस॒ताध्व॒र्यो क्षि॒प्रं प्र॒चर॑ ।\nसु॒स॒त्यमिद्गवा॑म॒स्यसि॑ प्रखु॒दसि॑ ॥४॥\nप॒त्नी यदृ॑श्यते प॒त्नी यक्ष्य॑माणा जरित॒रोऽथामो॑ दै॒व।\nहो॒ता वि॑ष्टीमे॒न ज॑रित॒रोऽथामो॑ दै॒व॥५॥\nआदि॑त्या ह जरितरङ्गि॑रोभ्यो॒ दक्षि॑णाम॒नय॑न्।\nतां ह॑ जरितः॒ प्रत्या॑यं॒स्तामु ह॑ जरितः॒ प्रत्या॑यन्॥६॥\nतां ह॑ जरितर्नः॒ प्रत्य॑गृभ्णं॒स्तामु ह॑ जरितर्नः॒ प्रत्य॑गृभ्णः ।\nअहा॑नेतरसं न॒ वि चे॒तना॑नि य॒ज्ञानेत॑रसं न॒ पुरो॒गवा॑मः ॥७॥\nउ॒त श्वेत॒ आशु॑पत्वा उ॒तो पद्या॑भि॒र्यवि॑ष्ठः ।\nउ॒तेमाशु॒ मानं॑ पिपर्ति ॥८॥\nआदि॑त्या रु॒द्रा वस॑व॒स्त्वेनु॑ त इ॒दं राधः॒ प्रति॑ गृभ्णीह्यङ्गिरः ।\nइ॒दं राधो॑ वि॒भु प्रभु॑ इ॒दं राधो॑ बृ॒हत्पृथु॑ ॥९॥\nदेवा॑ दद॒त्वासु॑रं॒ तद्वो॑ अस्तु॒ सुचे॑तनम्।\nयुष्मां॑ अस्तु॒ दिवे॑दिवे प्र॒त्येव॑ गृभायत्॥१०॥\nत्वमि॑न्द्र श॒र्मरि॑णा ह॒व्यं पारा॑वतेभ्यः ।\nविप्रा॑य स्तुव॒ते व॑सु॒वनिं॑ दुरश्रव॒से व॑ह ॥११॥\nत्वमि॑न्द्र क॒पोता॑य च्छिन्नप॒क्षाय॒ वञ्च॑ते ।\nश्यामा॑कं प॒क्वं पीलु॑ च॒ वार॑स्मा॒ अकृ॑णोर्ब॒हुः ॥१२॥\nअ॒रं॒ग॒रो वा॑वदीति त्रे॒धा ब॒द्धो व॑र॒त्रया॑ ।\nइरा॑मह॒ प्रशं॑स॒त्यनि॑रा॒मप॑ सेधति ॥१३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 136,
"text": "खिलानि ।\nयद॑स्या अंहु॒भेद्याः॑ कृ॒धु स्थू॒लमु॒पात॑सत्।\nमु॒ष्काविद॑स्या एज॒तो गो॑श॒फे श॑कु॒लावि॑व ॥१॥\nयदा॑ स्थू॒लेन॒ पस॑साणौ मु॒ष्का उपा॑वधीत्।\nविष्व॑ञ्चा व॒स्या वर्ध॑तः॒ सिक॑तास्वेव॒ गर्द॑भौ ॥२॥\nयदल्पि॑का॒स्वऽल्पिका॒ कर्क॑धू॒केव॒षद्य॑ते ।\nवास॑न्ति॒कमि॑व॒ तेज॑नं॒ यन्त्य॒वाता॑य॒ वित्प॑ति ॥३॥\nयद्दे॒वासो॑ ललामगुं॒ प्रवि॑ष्टी॒मिन॑माविषुः ।\nस॒कु॒ला दे॑दिश्यते॒ नारी॑ स॒त्यस्या॑क्षि॒भुवो॑ यथा ॥४॥\nम॒हा॒न॒ग्न्यतृप्नद्वि॒ मोक्र॑द॒दस्था॑नासरन्।\nशक्ति॑का॒नना स्व॑च॒मश॑कं सक्तु॒ पद्य॑म ॥५॥\nम॒हा॒न॒ग्न्युलूखलमति॒क्राम॑न्त्यब्रवीत्।\nयथा॒ तव॑ वनस्पते॒ निर॑घ्नन्ति॒ तथै॑वति ॥६॥\nम॒हा॒न॒ग्न्युप॑ ब्रूते भ्र॒ष्टोथाप्य॑भूभुवः ।\nयथै॒व ते॑ वनस्पते॒ पिप्प॑ति॒ तथै॑वति ॥७॥\nम॒हा॒न॒ग्न्युप॑ ब्रूते भ्र॒ष्टोथाप्य॑भूभुवः ।\nयथा॑ वयो॒ विदाह्य॑ स्व॒र्गे न॒मवद॑ह्यते ॥८॥\nम॒हा॒न॒ग्न्युप॑ ब्रूते स्वसा॒वेशि॑तं॒ पसः॑ ।\nइ॒त्थं फल॑स्य॒ वृक्ष॑स्य॒ शूर्पे॑ शूर्पं॒ भजे॑महि ॥९॥\nम॒हा॒न॒ग्नी कृ॑कवाकं॒ शम्य॑या॒ परि॑ धावति ।\nअ॒यं न वि॒द्म यो॑ मृ॒गः शी॒र्ष्णा ह॑रति॒ धाणि॑काम्॥१०॥\nम॒हा॒न॒ग्नी म॑हान॒ग्नं धाव॑न्त॒मनु॑ धावति ।\nइ॒मास्तद॑स्य॒ गा र॑क्ष॒ यभ॒ माम॑द्ध्यौद॒नम्॥११॥\nसुदे॑वस्त्वा म॒हान॑ग्नी॒र्बबा॑धते मह॒तः सा॑धु खो॒दन॑म्।\nकु॒सं पीव॒रो न॑वत्॥१२॥\nव॒शा द॒ग्धामि॑माङ्गु॒रिं प्रसृ॑जतो॒ग्रतं॑ परे ।\nम॒हान्वै भ॒द्रो यभ॒ माम॑द्ध्यौद॒नम्॥१३॥\nविदे॑वस्त्वा म॒हान॑ग्नी॒र्विबा॑धते मह॑तः सा॑धु खो॒दन॑म्।\nकु॒मा॒री॒का पि॑ङ्गलि॒का कार्द॒ भस्मा॑ कु॒ धाव॑ति ॥१४॥\nम॒हान्वै भ॒द्रो बि॒ल्वो म॒हान्भ॑द्र उदु॒म्बरः॑ ।\nम॒हां अ॑भि॒क्त बा॑धते मह॒तः सा॑धु खो॒दन॑म्॥१५॥\nयः कु॑मा॒री पि॑ङ्गलि॒का वस॑न्तं पीव॒री ल॑भेत्।\nतैल॑कुण्ड॒मिमा॑ङ्गु॒ष्ठं रोद॑न्तं शुद॒मुद्ध॑रेत्॥१६॥\n॥इति कुन्तापसूक्तानि॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 137,
"text": "यद्ध॒ प्राची॒रज॑ग॒न्तोरो॑ मण्डूरधाणिकीः ।\nह॒ता इन्द्र॑स्य॒ शत्र॑वः॒ सर्वे॑ बुद्बु॒दया॑शवः ॥१॥\nकपृ॑न्नरः कपृ॒थमुद्द॑धातन चो॒दय॑त खु॒दत॒ वाज॑सातये ।\nनि॒ष्टि॒ग्र्यः पु॒त्रमा च्या॑वयो॒तय॒ इन्द्रं॑ स॒बाध॑ इ॒ह सोम॑पीतये ॥२॥\nद॒धि॒क्राव्णो॑ अकारिषं जि॒ष्णोरश्व॑स्य वा॒जिनः॑ ।\nसु॒र॒भि नो॒ मुखा॑ कर॒त्प्र ण॒ आयूं॑षि तारिषत्॥३॥\nसु॒तासो॒ मधु॑मत्तमाः॒ सोमा॒ इन्द्रा॑य म॒न्दिनः॑ ।\nप॒वित्र॑वन्तो अक्षरन्दे॒वान्ग॑च्छ॑न्तु वो॒ मदाः॑ ॥४॥\nइन्दु॒रिन्द्रा॑य पवत॒ इति॑ दे॒वासो॑ अब्रुवन्।\nवा॒चस्पति॑र्मखस्यते॒ विश्व॒स्येशा॑न॒ ओज॑सा ॥५॥\nस॒हस्र॑धारः पवते समु॒द्रो वा॑चमीङ्ख॒यः ।\nसोमः॒ पती॑ रयी॒णां सखेन्द्र॑स्य दि॒वेदि॑वे ॥६॥\nअव॑ द्र॒प्सो अं॑शु॒मती॑मतिष्ठदिया॒नः कृ॒ष्णो द॒शभिः॑ स॒हस्रैः॑ ।\nआव॒त्तमिन्द्रः॒ शच्या॒ धम॑न्त॒मप॒स्नेहि॑तीर्नृ॒मणा॑ अधत्त ॥७॥\nद्र॒प्सम॑पश्यं॒ विषु॑णे॒ चर॑न्तमुपह्व॒रे न॒द्यो अंशु॒मत्याः॑ ।\nनभो॒ न कृ॒ष्णम॑वतस्थि॒वांस॒मिष्या॑मि वो वृषणो॒ युध्य॑ता॒जौ॥८॥\nअध॑ द्र॒प्सो अं॑शु॒मत्या॑ उ॒पस्थेऽधा॑रयत्त॒न्वं॑ तित्विषा॒णः ।\nविशो॒ अदे॑वीर॒भ्या॒३चर॑न्ती॒र्बृह॒स्पति॑ना यु॒जे॑न्द्रः॑ ससाहे ॥९॥\nत्वं ह॒ त्यत्स॒प्तभ्यो॒ जाय॑मानोऽश॒त्रुभ्यो॑ अभवः॒ शत्रु॑रिन्द्र ।\nगू॒ल्हे द्यावा॑पृथि॒वी अन्व॑विन्दो विभु॒मद्भ्यो॒ भुव॑नेभ्यो॒ रणं॑ धाः ॥१०॥\nत्वं ह॒ त्यद॑प्रतिमा॒नमोजो॒ वज्रे॑ण वज्रिन्धृषि॒तो ज॑घन्थ ।\nत्वं शुष्ण॒स्यावा॑तिरो॒ वध॑त्रै॒स्त्वं गा इ॑न्द्र॒ शच्येद॑विन्दः ॥११॥\nतमिन्द्रं॑ वाजयामसि म॒हे वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे । स वृषा॑ वृष॒भो भु॑वत्॥१२॥\nइन्द्रः॒ स दाम॑ने कृ॒त ओजि॑ष्ठः॒ स मदे॑ हि॒तः । द्यु॒म्नी श्लो॒की स सो॒म्यः ॥१३॥\nगि॒रा वज्रो॒ न संभृ॑तः॒ सब॑लो॒ अन॑पच्युतः । व॒व॒क्ष ऋ॒ष्वो अस्तृ॑तः ॥१४॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 138,
"text": "म॒हाँ इन्द्रो॒ य ओज॑सा प॒र्जन्यो॑ वृष्टि॒माँ इ॑व । स्तोमै॑र्व॒त्सस्य॑ वावृधे ॥१॥\nप्र॒जामृ॒तस्य॒ पिप्र॑तः॒ प्र यद्भर॑न्त॒ वह्न॑यः । विप्रा॑ ऋ॒तस्य॒ वाह॑सा ॥२॥\nकण्वाः॒ इन्द्रं॒ यदक्र॑त॒ स्तोमै॑र्य॒ज्ञस्य॒ साध॑नम्। जा॒मि ब्रु॑वत॒ आयु॑धम्॥३॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 139,
"text": "आ नू॒नम॑श्विना यु॒वं व॒त्सस्य॑ गन्त॒मव॑से ।\nप्रास्मै॑ यच्छतमवृ॒कं पृ॒थु च्छ॒र्दिर्यु॑यु॒तं या अरा॑तयः ॥१॥\nयद॒न्तरि॑क्षे॒ यद्दि॒वि यत्पञ्च॒ मानु॑षाँ॒ अनु॑ । नृ॒म्णं तद्ध॑त्तमश्विना ॥२॥\nये वां॒ दंसां॑स्यश्विना॒ विप्रा॑सः परिमामृ॒शुः । ए॒वेत्का॒ण्वस्य॑ बोधतम्॥३॥\nअ॒यं वां॑ घ॒र्मो अ॑श्विना॒ स्तोमे॑न॒ परि॑ षिच्यते ।\nअ॒यं सोमो॒ मधु॑मान्वाजिनीवसू॒ येन॑ वृ॒त्रं चिके॑तथः ॥४॥\nयद॒प्सु यद्वन॒स्पतौ॒ यदोष॑धीषु पुरुदंससा कृ॒तम्। तेन॑ माविष्टमश्विना ॥५॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 140,
"text": "यन्ना॑सत्या भुर॒ण्यथो॒ यद्वा॑ देव भिष॒ज्यथः॑ ।\nअ॒यं वां॑ व॒त्सो म॒तिभि॒र्न वि॑न्धते ह॒विष्म॑न्तं॒ हि गच्छ॑थः ॥१॥\nआ नू॒नम॒श्विनो॒र्ऋषि॒ स्तोमं॑ चिकेत वा॒मया॑ ।\nआ सोमं॒ मधु॑मत्तमं घ॒र्मं सि॑ञ्चा॒दथ॑र्वणि ॥२॥\nआ नू॒नं र॒घुव॑र्तनिं॒ रथं॑ तिष्ठाथो अश्विना ।\nआ वां॒ स्तोमा॑ इ॒मे मम॒ नभो॒ न चु॑च्यवीरत ॥३॥\nयद॒द्य वां॑ नासत्यो॒क्थैरा॑चुच्युवी॒महि॑ ।\nयद्वा॒ वाणी॑भिरश्विने॒वेत्क॒ण्वस्य॑ बोधतम्॥४॥\nयद्वां॑ क॒क्षीवां॑ उ॒त यद्व्य॑श्व॒ ऋषि॒र्यद्वां॑ दी॒र्घत॑मा जु॒हाव॑ ।\nपृथी॒ यद्वां॑ वै॒न्यः साद॑नेष्वे॒वेदतो॑ अश्विना चेतयेथाम्॥५॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 141,
"text": "या॒तं छ॑र्दि॒ष्पा उ॒त नः॑ पर॒स्पा भू॒तं ज॑ग॒त्पा उ॒त न॑स्तनू॒पा।\nव॒र्तिस्तो॒काय॒ तन॑याय यातम्॥१॥\nयदिन्द्रे॑ण स॒रथं॑ या॒थो अ॑श्विना॒ यद्वा॑ वा॒युना॒ भव॑थः॒ समो॑कसा ।\nयदा॑दि॒त्येभि॑रृ॒भुभिः॑ स॒जोष॑सा॒ यद्वा॒ विष्णो॑र्वि॒क्रम॑णेषु॒ तिष्ठ॑थः ॥२॥\nयद॒द्याश्विना॑व॒हं हु॒वेय॒ वाज॑सातये । यत्पृ॒त्सु तु॒र्वणे॒ सन॒स्तच्छ्रेष्ठ॑म॒श्विनो॒रवः॑ ॥३॥\nआ नू॒नं या॑तमश्विने॒मा ह॒व्यानि॑ वां हि॒ता।\nइ॒मे सोमा॑सो॒ अधि॑ तु॒र्वशे॒ यदा॑वि॒मे कण्वे॑षु वा॒मथ॑ ॥४॥\nयन्ना॑सत्या परा॒के अ॑र्वा॒के अस्ति॑ भेष॒जम्।\nतेन॑ नू॒नं वि॑म॒दाय॑ प्रचेतसा छ॒र्दिर्व॒त्साय॑ यच्छतम्॥५॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 142,
"text": "अभु॑त्स्यु॒ प्र दे॒व्या सा॒कं वा॒चाहम॒श्विनोः॑ । व्या॑वर्दे॒व्या म॒तिं वि रा॒तिं मर्त्ये॑भ्यः ॥१॥\nप्र बो॑धयोषो अ॒श्विना॒ प्र दे॑वि सूनृते महि । प्र य॑ज्ञहोतरानु॒षक्प्र मदा॑य॒ श्रवो॑ बृ॒हत्॥२॥\nयदु॑षो॒ यासि॑ भा॒नुना॒ सं सूर्ये॑ण रोचसे । आ हा॒यम॒श्विनो॒ रथो॑ व॒र्तिर्या॑ति नृ॒पाय्य॑म्॥३॥\nयदापी॑तासो अं॒शवो॒ गावो॒ न दु॒ह्र ऊध॑भिः । यद्वा॒ वाणी॒रनु॑षत॒ प्र दे॑व॒यन्तो॑ अ॒श्विना॑ ॥४॥\nप्र द्यु॒म्नाय॒ प्र शव॑से॒ प्र नृ॒षाह्या॑य॒ शर्म॑णे । प्र दक्षा॑य प्रचेतसा ॥५॥\nयन्नू॒नं धी॒भिर॑श्विना पि॒तुर्योना॑ नि॒षीद॑थः । यद्वा॑ सु॒म्नेभि॑रुक्थ्या ॥६॥\n"
},
{
"veda": "atharvaveda",
"samhita": "shaunak",
"kaanda": 20,
"sukta": 143,